आकाशी
स्नेहा सिंह
जब आकाशी आठ साल की थी, तब गाँव के डॉक्टर ने उसे बुलाकर कहा, “आकाशी, तुम्हारी माँ का इलाज मुझसे सम्भव नहीं है। बीमारी बड़ी है। इसलिए उन्हें अहमदाबाद की सिविल अस्पताल में ले जाओ। मुझे पता है कि यहाँ तुम्हारा कोई रिश्तेदार नहीं है। लो, यह एक हज़ार रुपए तुम्हारे काम आएँगे।”
आकाशी डॉक्टर के चेहरे की ओर देखती रह गई। बड़े शहर में कैसे जाना है, यह भी उसे पता नहीं था। उसने एक बार गाँव में बस आते देखा था। बस यात्रियों को उतारकर वापस मुड़ती, तो गाँव के छोटे बच्चे बस के पीछे भागकर उसे पकड़ लेते। आकाशी भी उनके साथ दौड़ती। धूल और धुएँ की परवाह नहीं करती। जब बस तेज़ हो जाती, तो कुछ बच्चे गिर पड़ते, फिर उठकर हँसते हुए लौट जाते। उन बच्चों में आकाशी भी थी।
आकाशी लड़की थी, लेकिन उसे लड़कों के खेल ही ज़्यादा पसंद थे। जब उसकी माँ क्षमादेवी उसे डाँटती, तो वह कहती, “माँ, मैं तो आपका बेटा हूँ, ऐसा आप रोज़ कहती हैं। फिर मैं पीछे क्यों रहूँ? मैं आपका बेटा बनकर दिखाऊँगी। मैं बड़ी होकर आपकी सारी इच्छाएँ पूरी करूँगी। मुझे फ्राक की जगह पैंट-शर्ट पहनना ज़्यादा अच्छा लगता है। हमारे महल्ले के सारे लड़के मेरे दोस्त हैं। मैं उनकी लीडर हूँ। मैं जो कहती हूँ, वही सब करते हैं। आपने ही तो कहा है कि बेटा-बेटी में भेद नहीं करना चाहिए।”
डॉक्टर की बात सुनकर आकाशी घबरा गई। पैसे नहीं, माँ बीमार, ख़ुद बहुत छोटी है, क्या करेगी? कैसे शहर जाएगी?
डॉक्टर ने उसे बुलाकर शहर के डॉक्टर के नाम एक सिफ़ारिश पत्र लिखा। इससे आकाशी को हिम्मत मिली। उसने माँ को गले लगाकर कहा, “माँ, मैं तुम्हारा इलाज करवाऊँगी। भगवान हमारी मदद करेगा। कल सुबह की बस से हम शहर जाएँगे। तुम रास्ते के लिए रोटी बना लेना। ये हज़ार रुपए रख लो।”
अगले दिन वह अपनी माँ को लेकर अहमदाबाद पहुँची। बसस्टैंड के पास ही नगरपालिका अस्पताल था। वह वहाँ पहुँचीं, लेकिन ओपीडी का समय ख़त्म हो चुका था। वॉर्डबॉय ने कहा, “अब डॉक्टर शाम को मिलेंगे।”
आकाशी ने विनती करके अपनी माँ को बेंच पर लिटा दिया और शाम तक वहीं रहने की अनुमति ले ली।
शाम को डॉक्टर आए। उन्होंने बेंच पर लेटी आकाशी की माँ को देखा, तो बुलवाया। डॉक्टर ने पूछा, “बेटा, तुम्हारे साथ कोई बड़ा है?”
आकाशी बोली, “नहीं साहब, यहाँ मेरा कोई नहीं है, सिवाय भगवान और आप के।”
उसकी बात सुनकर डॉक्टर भावुक हो गए। आकाशी ने आगे कहा, “साहब, हमारे गाँव के डॉक्टर ने आपके नाम चिट्ठी दी है। मेरे पास पाँच सौ रुपए बचे हैं। क्या इससे मेरी माँ ठीक हो जाएगी? आप इसे रख लीजिए।”
डॉक्टर समझ गए कि ऑपरेशन ज़रूरी है और कई दिन अस्पताल में रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “बेटा, तुम्हारी माँ को भर्ती करना पड़ेगा। तुम चिंता मत करो, मैं सब व्यवस्था करूँगा।”
आकाशी की माँ को महिला वार्ड में भर्ती किया गया। वहाँ कई बीमार महिलाएँ थीं। आकाशी बोली, “अरे, इतनी सारी मम्मियाँ बीमार हैं। लेकिन इनके पास मेरे जैसा कोई बच्चा क्यों नहीं है?”
रात को माँ ने खाना आधा खाकर बाक़ी आकाशी के लिए बचा लिया। आकाशी समझ गई और माँ को पूरा खाना खिलाया। थकी हुई आकाशी माँ की छाती पर सिर रखकर सो गई।
तभी कृपा सिस्टर आईं और बोलीं, “यह बच्ची बिलकुल अकेली है। डॉक्टर ने इसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी मुझे दी है। अब हम ही इसके माँ-बाप हैं।”
सुबह डॉक्टरों का राउंड शुरू हुआ। आकाशी कल वाले डॉक्टर का इंतज़ार कर रही थी। आख़िर वह आए। आकाशी दौड़कर उनका हाथ पकड़ कर लाई। एक डॉक्टर ने कहा, “इस शरारती लड़की को हटाओ।”
लेकिन वह डॉक्टर बोले, “इसे हमारे साथ रहने दो।” उन्होंने आगे कहा, “बेटा, सभी मम्मियों का हाल पूछना। मेरी भी माँ नहीं है। इसलिए मैं सबका बेटा हूँ।”
आकाशी की आँखें भर आईं। दो दिन बाद ऑपरेशन तय हुआ। आकाशी बाहर बैठी रही, पानी तक नहीं पिया। चार घंटे बाद दरवाज़ा खुला, माँ को सफ़ेद चादर में बाहर लाया गया। डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। उन्होंने आकाशी की माँ के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। आकाशी रोती रही। शाम को डॉक्टर उसे अपने घर ले गए। उन्होंने कहा, “अब यह शहर तुम्हारा घर है। कृपा सिस्टर तुम्हारी माँ हैं। मैं तुम्हें पढ़ाकर डॉक्टर बनाऊँगा। तुमने एक माँ खोई है, लेकिन हज़ारों माँएँ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।”
कृपा सिस्टर उसे अपने घर ले गईं। उसका पूरा ख़र्च डॉक्टर उठाते रहे।
१८ साल बाद कृपा सिस्टर और डॉक्टर दोनों वृद्ध हो चुके थे। और उसी केबिन में अब बैठती है डॉ. आकाशी। दीवार पर दो तस्वीरें लगी हैं—डॉक्टर पापा और करुणा मम्मी।
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