प्रेम का प्रतिकार

01-06-2026

प्रेम का प्रतिकार

स्नेहा सिंह (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

घर में प्रवेश करते ही नंदिनी बिना इधर-उधर देखे दौड़ती हुई अपने कमरे में गई और बैग टेबल पर फेंककर कटे हुए वृक्ष की तरह बिस्तर पर गिर पड़ी। उसके मन में जैसे तूफ़ान उठा हुआ था। उसने पहले कभी स्वयं को इतना अकेला और असहाय महसूस नहीं किया था। आज उसे अपनी सारी सफलताएँ, ऊँचा पद, सम्मान, सब कुछ निरर्थक लग रहा था। प्रेम में मिले धोखे ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था। उसे लग रहा था कि मानो सब कुछ समाप्त हो गया है। अब उसके पास बची थी तो केवल एक गहरी, सुनसान और अकेली ज़िन्दगी।

जिस प्रेम के कारण उसके सारे रिश्ते टूट गए थे, उसी प्रेम ने आज उसे पूरी तरह बिखेर दिया था। शुरूआत में उसने ख़ुद को बहुत समझाया था कि किसी विवाहित पुरुष से प्रेम करना ग़लत है। लेकिन जैसे ही प्रशांत उसके सामने आता, उसके सारे तर्क खो जाते। धीरे-धीरे ऐसा समय आया, जब वह अपने सभी रिश्तों को भुलाकर प्रशांत के साथ अटूट बंधन में बँध जाने को व्याकुल हो उठी।

कुछ ही समय पहले तक वह अपनी माँ और छोटे भाई आदित्य के साथ अपनी छोटी-सी दुनिया में बेहद ख़ुश थी। उसका एक ही सपना था, आदित्य को पढ़ा-लिखाकर सफल बनाना और अपनी माँ को वह सारे सुख देना, जो उन्हें कभी नहीं मिले।

उसकी मेहनत और लगन ने उसके सारे सपने पूरे कर दिए थे। मैनेजमेंट की डिग्री मिलते ही उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई थी। नौकरी मिलते ही जीवन की कठिनाइयाँ आसान होने लगीं। आदित्य की पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था हो गई और घर में सुख-सुविधाएँ भी आने लगीं।

इन्हीं दिनों उसकी मुलाक़ात प्रशांत से हुई। प्रशांत पुणे से ट्रांसफर होकर उसके विभाग के प्रमुख पद पर आया था। लंबा और आकर्षक व्यक्तित्व वाला प्रशांत उसे पहली ही नज़र में अच्छा लगा था। काम के सिलसिले में नंदिनी की उससे बार-बार मुलाक़ात होने लगी। जल्द ही नंदिनी को महसूस होने लगा कि जब भी वह प्रशांत के पास जाती है, वह भी उसे देखकर खिल उठता है।

यही उस मीठे लेकिन विषैले संबंध की शुरुआत थी, जिसे लगातार मिलने-जुलने ने गहरा बना दिया। कब वह निकटता प्रेम में बदल गई, नंदिनी को पता ही नहीं चला। जब उसे अहसास हुआ, तब तक प्रशांत उसकी दुनिया में पूरी तरह समा चुका था।

उमा ने उसे चेतावनी दी थी कि प्रशांत शादीशुदा है और एक बच्चे का पिता भी है। लेकिन नंदिनी अपने भावनात्मक आकर्षण से बाहर नहीं निकल सकी।

कभी भविष्य की अनिश्चितता उसे डरा देती, तो कभी किसी दूसरी स्त्री का अधिकार छीनने का अपराधबोध उसे बेचैन कर देता। जब भी वह अपनी आशंकाएँ प्रशांत के सामने रखती, वह हँसकर कहता कि वह जल्द ही अपनी पागल और अनपढ़ पत्नी को तलाक़ दे देगा और नंदिनी से विवाह करेगा।

प्रशांत की बातों ने उसे भरोसा दिया और वह उसके प्रेम में इतनी डूबती चली गई कि अपने परिवार और दोस्तों तक से दूर हो गई।

आज जब उसका प्रेम उससे छिन गया था, तब उसका मन चाहता था कि वह माँ की गोद में सिर रखकर ख़ूब रो ले। लेकिन उसने वह अधिकार भी खो दिया था। जिस माँ ने उसे पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाया, उसी माँ को उसने इतना दुख दिया कि वे हँसना तक भूल गईं।

पिता की मृत्यु के बाद संघर्षों से लड़ते हुए गायत्री ने कभी हार नहीं मानी थी। लेकिन वे तब टूट गईं, जब उनकी सबसे समझदार बेटी ने उनके विश्वास को तोड़ दिया।

जब गायत्री को नंदिनी और प्रशांत के संबंध के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की, “नंदिनी, तू कैसी मृगतृष्णा के पीछे भाग रही है? मुझे तेरे प्रेम से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह व्यक्ति विवाहित है। तू जानती है न कि किसी विवाहित पुरुष से प्रेम करने का परिणाम क्या होता है? तू अपनी ज़िन्दगी तो बरबाद करेगी ही, साथ ही दूसरी स्त्री के दुख का कारण भी बनेगी।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर प्रशांत तलाक़ देकर तुझसे शादी भी कर ले, तो क्या तूने सोचा है कि उसकी पत्नी, जिसने पूरा जीवन गृहस्थी में बिताया है, वह इस उम्र में कहाँ जाएगी? लोग तुझे और तेरे बच्चों को भी ताने देंगे। आज तुझे प्रशांत में केवल अच्छाइयाँ दिखाई दे रही हैं, क्योंकि प्रेम ने तेरी आँखों पर पर्दा डाल रखा है। ज़रा सोच, जो व्यक्ति अपनी पत्नी के अधिकार छीन सकता है, क्या वह जीवन-भर भरोसे के लायक़ हो सकता है?”

माँ की बातों से नंदिनी कुछ देर के लिए डगमगा गई थी। उसने उनसे वादा भी किया था कि वह नया जीवन शुरू करेगी। लेकिन अगले ही दिन ऑफ़िस पहुँचते ही उसके सारे संकल्प टूट गए। धीरे-धीरे उसकी माँ और भाई दोनों उससे दूर हो गए।

अगर उस दिन अस्पताल में उसकी मुलाक़ात प्रशांत की पत्नी आरती से न हुई होती, तो शायद उसे कभी अपनी ग़लती का अहसास नहीं होता।

ऑफ़िशियल टूर से लौटते ही उसे पता चला कि प्रशांत का एक्सीडेंट हो गया है और वह अस्पताल में भर्ती है। वह भागी-भागी अस्पताल पहुँची। प्रशांत के पैर में प्लास्टर था।

प्रशांत ने मुस्कराकर उसका स्वागत किया और परिवारवालों से परिचय करवाया। तभी उसकी नज़र एक स्त्री पर पड़ी, जो खिड़की के पास ख़ामोश खड़ी थी।

“यह आरती है,” प्रशांत ने धीमे से कहा।

आरती को देखकर नंदिनी का दिल काँप उठा। साधारण चेहरे और साँवले रंग वाली उस स्त्री के चेहरे पर असीम शान्ति और उदासी थी। उसकी आँखों में न कोई कटाक्ष था, न शिकायत। बस एक गहरा मौन।

उसकी निस्संगता ने नंदिनी के भीतर अपराधबोध भर दिया। उसे लगा कि अपनी सुंदरता, पद और धन का उसे कोई अभिमान नहीं रह गया।

थोड़ी देर बाद आरती सेब काटकर लाई। उसने एक प्लेट प्रशांत को दी और दूसरी नंदिनी की ओर बढ़ाई। उनकी आँखें मिलीं और नंदिनी समझ गई कि आरती सब जानती है।

आरती जिस प्रेम और समर्पण से प्रशांत की सेवा कर रही थी, उसने नंदिनी को भीतर तक झकझोर दिया। उसे लगा कि वह कितनी निर्दयी बन गई थी।

उसका अंतर्मन चीख़ उठा, ‘नहीं, मैं इतनी क्रूर नहीं हो सकती।’

वह प्रशांत के पास बैठ कर बोली, “प्रशांत, यह सच है कि मैं आपके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकती। फिर भी आज और अभी मैं हमेशा के लिए आपका त्याग करती हूँ। मैं अपने सुख के लिए किसी दूसरी स्त्री के साथ अन्याय नहीं कर सकती। अगर आपने मुझसे कभी थोड़ा भी प्रेम किया है, तो आरती को अपना लीजिए। केवल आपका प्रेम ही उन्हें इस दुख से बाहर ला सकता है। अगर आपने ऐसा नहीं किया, तो लंबी क़ानूनी लड़ाई के लिए तैयार रहिए। मैं आरती का साथ दूँगी।”

फिर वह आरती के पास जाकर बोली, “मैं आपके प्रशांत को छोड़कर हमेशा के लिए जा रही हूँ। लेकिन जाते-जाते एक बात कहना चाहती हूँ। अपना आत्मसम्मान खोकर केवल पति की दासी बन जाना पतिव्रता होना नहीं है। यह अन्याय को बढ़ावा देना है। हम स्त्रियाँ केवल सहने के लिए पैदा नहीं हुई हैं। हमारे पास भी आत्मसम्मान और भावनाएँ हैं। बिना प्रतिकार किए हार मान लेना कायरता है। एक बार अपने अधिकारों के लिए लड़कर तो देखिए, जीवन जीने का उद्देश्य मिल जाएगा।”

इतना कहकर वह वहाँ से चली आई। अब वह अपने कमरे में पड़ी थी। तभी उसकी माँ चाय लेकर कमरे में आईं। नंदिनी का आँसुओं से भीगा चेहरा देखकर वे चुपचाप उसके पास बैठ गईं।

नंदिनी फूट-फूटकर रो पड़ी। उसके आँसुओं ने सारी कहानी कह दी। फिर उसने माँ को अस्पताल में हुई सारी बातें बता दीं।

चार महीने से मौन रहने वाली माँ आख़िर बोलीं, “अब बस भी कर। बहुत पश्चात्ताप कर लिया तूने। ज़िन्दगी केवल प्रशांत से शुरू होकर उसी पर ख़त्म नहीं होती। रास्ते और मंज़िलें बहुत हैं। भविष्य की सुंदर ज़िन्दगी तेरा इंतज़ार कर रही है। बस हिम्मत रख।”

“मेरी वजह से आप लोगों ने भी बहुत दुख झेले हैं माँ,” नंदिनी ने कहा।

माँ ने उसे समझाया और सलाह दी कि वह नोएडा से कहीं दूर तबादला करवा ले।

माँ की बात मानकर नंदिनी ने छुट्टियाँ लीं और अपना ट्रांसफ़र बड़ौदा करवा लिया। धीरे-धीरे उसने अपनी कमज़ोरियों को पीछे छोड़ दिया और एक मज़बूत व्यक्तित्व बन गई।

कुछ महीनों बाद उमा ने उसे बताया कि आरती अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गई है। उसने अन्याय का प्रतिकार करना सीख लिया है। आरती के इस बदले हुए रूप के आगे झुककर प्रशांत ने अंततः अपनी पत्नी को अपना लिया था। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
सांस्कृतिक आलेख
किशोर साहित्य कहानी
कविता
ऐतिहासिक
काम की बात
सामाजिक आलेख
स्वास्थ्य
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में