वांछित वर
संजय मृदुल
“वरुण भाई, आपकी बिटिया के लिए एक बहुत अच्छा सम्बन्ध मिला है। अपने ही शहर के रहने वाले हैं। हैं तो मिडिल क्लास लेकिन परिवार बहुत अच्छा है।”
“बहुत अच्छी बात है। बेटी की इस साल शादी करनी ही है। लेकिन नीलेश भाई, लड़का क्या करता है?”
“लड़का अभी-अभी नौकरी में लगा है। बस्तर में पोस्टिंग है, लोअर डिविज़न क्लर्क है। आप सरकारी नौकरी वाला लड़का ही ढूँढ़ रहे हैं न। इसलिए मुझे लगा आपको बताऊँ।”
“ओह! क्लर्क है लड़का।”
“जी। पिताजी भी सरकारी नौकरी में रहे हैं। अधीक्षक होकर पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। ये बड़ा लड़का है छोटा अभी चेन्नई में इंजीनियरिंग पढ़ रहा है।”
“यार नीलेश भाई! क्लर्क है तो अभी पगार भी कम होगी। वहाँ अकेले रहेंगे तो ख़र्च कैसे चलेगा? मकान का किराया, घर के ख़र्चे, अपने ख़र्चे, बचा क्या पाएँगे?”
“वरुण भाई, एक बात पूछूँ, बुरा तो नहीं मानेंगे?”
“अरे कैसी बात करते हैं? पूछिए न, आप तो पुराने मित्र हैं हमारे।”
“आपकी जब शादी हुई थी तब आप किस पद पर थे?”
“मैं क्लर्क की पोस्ट पर था। लेकिन ये बात क्यों पूछ रहे हो?”
“अगर तब आपके ससुर ने यही बात सोची होती जो आप कह रहे हैं तो आपकी शादी भाभी से न हुई होती। तब तो आपकी पगार बमुश्किल दो ढाई सौ रुपए रही होगी। आज भले आप सेक्शन ऑफ़िसर हो लेकिन शुरू तो आपने भी वहीं से किया था। आप रहने दीजिए इस लड़के को। आप उस लड़के की तलाश कीजिए जो पच्चीस छब्बीस की उम्र में लाख डेढ़ लाख कमाता हो। ये परिवार आपके लायक़ नहीं।”
वरुण का सर झुक गया और वो बग़लें झाँकने लगे।