सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’ - मुक्तक (व्यंग्य) - 001
सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’
1.
दरिया पार जाना सभी ने चाहा, पर तैरा कोई कोई
दमकना सभी ने चाहा पर चमका कोई कोई
बिन दुःख के सुख सम्भव नहीं-
क्या गुलाब बनेंगे जो लोग हैं छुई-मुई?॥
2.
छपास की बीमारी एक समस्या भारी है
चाह नहीं पूरी तो पड़ती कसर भारी है,
चमकना और दमकना का अंतर नहीं मालूम—
मुझे तो सिर्फ़ छपने हेतु करनी तीमारदारी है॥