भावनाएँ और नदियाँ
सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’
अलग अलग ठोर से
निकलती नदियाँ
कभी उफनती कभी
शान्ति से बहती
राह में कई बाधाओं को पार
करती
मैदानी, जंगलों के रास्ते
एक आत्मा की भाँति अपनी
अच्छाई, बुराई को अपने भीतर
समेटे हुए
जा मिलती है परमात्मा रूपी
महासागर से
अपने अस्तित्व को भूलकर
मोक्ष को प्राप्त हो जाती है नदियाँ
भावनाएँ भी तो नदियों की
तरह हैं
उफनती हैं, जुड़ती-टूटती हैं
कभी मरकर ज़िन्दा हो उठतीं
और अंत में
हिलोरे मारती हुई
उमड़ते महासागर रूपी
हृदय में जा मिलतीं
सुख और दुःख का अनुभव
दोनों प्राप्त करतीं
बहते रहना सिखाती हैं।
एक ही तो अंतर है—
भावनाओं का आरंभ
और अंत केवल हृदय है
जबकि नदियों का तो
कहीं से भी निकलकर
सागर में मिलना तय है।