चश्मा दादाजी का

15-07-2025

चश्मा दादाजी का

सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’ (अंक: 281, जुलाई द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

(चश्मेबद्दूर दादाजी) 

चश्मा दादाजी का
अलादीन के चिराग़ सा
जादू से लबालब
चश्मा पहने दादाजी॥
सिखाते कोई सीख
कभी ग़लत नहीं जाती 
ठोकर खाते कभी भी नहीं 
बताई गई राह पर 
नहीं भटका कभी भी 
 
दिखता है चश्मे से उनको 
सब साथ-सम भाव
 
टूट जाती है जब कभी 
डंडी चश्मे की
बाँध लेते उसे अपने से 
जैसे बाँध रखा-
निज परिवार 

बताते रहते दादाजी
एक ही बात 
रहो सदा पक्के लँगोट के 
बिन चरित्र है धिक्कार । 

भाँप लेते सदा
 दूर की भी समस्या
जान लेते सभी के
मन की बात
हैरत में पड़ जाता सदा मैं
ये चश्मा है या ' संजय '! 
 
एक दिन 
जल्दबाज़ी में 
पहन लिया मैंने भी 
चश्मा दादाजी का 
लगा जैसे धुँधलाया सा 
दिखा नहीं कुछ भी साफ़! 
 
पूछा मैंने दादाजी को 
क्यूँ नज़र आई नहीं 
करामात? 
 
कहा सिर्फ़ इतना सा 
मैंने देख ली 
दुनिया 
तुम्हारी देखना बाक़ी ।

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