बेबस ठूँठ
सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’
सब ढूँढ़ते है छाँव कठिन ताप में
एक सरसब्ज़ दरख़्त की
स्वार्थपरायणता से बेख़बर वो निष्पाप दरख़्त
अपना सब कुछ लुटा बैठता है उन पर
भ्रम में था वह कि उसकी छाँव में बैठे—
सभी अगाध प्रेम करते है उससे
समय चक्र के फेर में
आया मौसम पतझड़ का
अब वह सरसब्ज़ से वीरान रह गया
बेबस सा खड़ा है अकेले
ताक रहा है उनको वे सब आयेंगे
और उसको सांत्वना व सहारा देंगे
उसके इस वीभत्स समय में
फल पत्तियों का बिछोह क्या कम था
कि उसके ही शरणार्थी अब
उसकी सूखी टहनियों पर
रंजिश, स्वार्थ या जलन—
जो उसके कभी सरसब्ज़ होने पर थी
तेज़ कुल्हाड़ियों का करने लगे प्रहार
अब वह सिर्फ़ बेबस बन कर रह गया,
ठूँठ बोलकर चिढ़ा रहे
पराए तो क्या उसके अपने भी ।
नफ़रत कर रहा वो अपने आप से कि
क्यूँ इन स्वार्थियों पर अपना सर्वस्व लुटाया
लेकिन वह ठूँठ जानता है बसंत-पतझड़ का फेर
आज ठूँठ हूँ लेकिन फिर एक कहीं से कोंपल फूटेगी
और फिर पहले जैसा सरसब्ज़ हो जाऊँगा
वह ठूँठ सोचता है कि—
फिर फटकने नहीं दूँगा उनको कभी पास
लेकिन वह ठूँठ शायद—
अपने ख़ानदानी त्याग से अनजान नहीं है॥
1 टिप्पणियाँ
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18 Apr, 2026 09:56 AM
कविता को पढ़ते समय एक विशेष प्रकार की 'भाषाई बेचैनी' (Linguistic Dissonance) का अनुभव करता हुं। इसका मुख्य कारण शब्दों का चयन है। एक ओर कवि 'शुद्ध वर्तनी' और तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं (जैसे: स्वार्थपरायणता, निष्पाप, सांत्वना, वीभत्स), वहीं दूसरी ओर अचानक उर्दू मूल के शब्दों का प्रवेश होता है (जैसे: बेखबर, दरख़्त)। यह मिश्रण कविता के 'टेक्सचर' को खंडित करता है। जब पाठक एक 'संस्कृतनिष्ठ' वातावरण में डूबा हो, तो अरबी-फ़ारसी मूल के शब्द एक 'जर्क' की तरह महसूस होते हैं। एक परिपक्व रचना के लिए यह आवश्यक है कि वह शुरू से अंत तक एक ही भाषाई लहजे (Diction) का पालन करे। यदि 'दरख़्त' है तो उसके साथ 'साया' जमता है, और यदि 'निष्पाप' है तो 'वृक्ष' अधिक न्यायसंगत लगता है।