बेबस ठूँठ

15-04-2026

बेबस ठूँठ

सुनील कुमार मिश्रा ‘मासूम’ (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सब ढूँढ़ते है छाँव कठिन ताप में
एक सरसब्ज़ दरख़्त की
स्वार्थपरायणता से बेख़बर वो निष्पाप दरख़्त
अपना सब कुछ लुटा बैठता है उन पर
भ्रम में था वह कि उसकी छाँव में बैठे—
सभी अगाध प्रेम करते है उससे
 
समय चक्र के फेर में
आया मौसम पतझड़ का
अब वह सरसब्ज़ से वीरान रह गया
बेबस सा खड़ा है अकेले
ताक रहा है उनको वे सब आयेंगे
और उसको सांत्वना व सहारा देंगे
उसके इस वीभत्स समय में
 
फल पत्तियों का बिछोह क्या कम था
कि उसके ही शरणार्थी अब
उसकी सूखी टहनियों पर
रंजिश, स्वार्थ या जलन—
जो उसके कभी सरसब्ज़ होने पर थी
तेज़ कुल्हाड़ियों का करने लगे प्रहार
 
अब वह सिर्फ़ बेबस बन कर रह गया,
ठूँठ बोलकर चिढ़ा रहे
पराए तो क्या उसके अपने भी ।
 
नफ़रत कर रहा वो अपने आप से कि
क्यूँ इन स्वार्थियों पर अपना सर्वस्व लुटाया
 
लेकिन वह ठूँठ जानता है बसंत-पतझड़ का फेर
आज ठूँठ हूँ लेकिन फिर एक कहीं से कोंपल फूटेगी
और फिर पहले जैसा सरसब्ज़ हो जाऊँगा
वह ठूँठ सोचता है कि—
फिर फटकने नहीं दूँगा उनको कभी पास
 
लेकिन वह ठूँठ शायद—
अपने ख़ानदानी त्याग से अनजान नहीं है॥

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