परिश्रम का फल

01-02-2021

परिश्रम का फल

अमिताभ वर्मा (अंक: 174, फरवरी प्रथम, 2021 में प्रकाशित)

आप-जैसे प्यारे-प्यारे बच्चों को देख कर मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। एक समय था जब मैं भी बारह-तेरह साल का था। यानी, आपका ख़याल मुझे आज से पचास साल पहले की दुनिया की ओर उड़ा ले जाता है। 

उन दिनों रेडियो पर बच्चों के लिए कार्यक्रम होता था, और मैं उसे बड़े चाव से सुनता था। अब तो आप टीवी और सोशल मीडिया के प्रोग्राम देखते हैं और उनमें भाग भी लेते हैं, है न? पर, मेरे बचपन में टीवी और सोशल मीडिया जैसी कोई चीज़ नहीं थी। या तो हम बच्चे रेडियो सुनते, या खेलते-कूदते। तरह-तरह के खेल — आई स्पाई, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, क्रिकेट, वग़ैरह।

अरे हाँ, एक बात तो मैं बताना ही भूल गया! हम कहानियाँ पढ़ते भी ख़ूब थे, सुनते भी ख़ूब थे। मम्मी-पापा के पास तो ज़्यादा कहानियाँ थी नहीं, वही घिसी-पिटी कहानियाँ वे दोबारा-तिबारा सुना देते। अलबत्ता, दादी-नानी-मौसी-चाची वग़ैरह हमारे घर आतीं, तो नई-नई कहानियाँ ज़रूर सुनने को मिलतीं। 

हमारे मुहल्ले में एक थे रामू काका। उनके पास तो कहानियों का जैसे अथाह भंडार था। सुबह और शाम तो वे गायों को चारा देने और बग़ीचे में सब्ज़ियों की देखभाल करने में मशग़ूल रहते, पर गर्मियों की दोपहर में जब वे आम के पेड़ के नीचे चारपाई पर लेटते, तो हमारी वानर सेना उनके इर्द-गिर्द जमा हो जाती।

"रामू काका, कहानी सुनाइए न!" मैं आग्रह करता।

"अरे बड़के, थोड़ा सुस्ता लेने दे," काका कहते।

मेरा छोटा भाई बोलता, "बस्स काका! एक छोटी-सी कहानी — इत्ती सी!"

काका कहते, "छोटके! शाम को सुनाऊँगा। अभी लेटने दे!"

"लेटे-लेटे सुनाइए न! शाम को तो आपको टाइम नहीं मिलेगा," मेरी बहन बोलती।

"अरे लल्ली! बड़ा परेशान करते हो तुम लोग," काका का दिल पसीजता। 

उनके दिल को पूरी तरह मोम की तरह पिघला देती मेरी सबसे छोटी बहन की विनती, "ताता! तहानी!"

काका हँसते। चारपाई पर बैठ कर उसे गोद में ले लेते। कहते, "अब मुन्नी ने कह दिया, तो सुनानी ही पड़ेगी कहानी।"

हम बच्चों के चेहरों पर रौनक़ आ जाती। जैसे क्रिकेट बोलर के गेंद फेंकते समय सभी खिलाड़ी तत्पर हो जाते हैं, हम भी वैसे ही पूरी तन्मयता से कहानी सुनने को तैयार हो जाते — मानो काका का हर शब्द एक कैच हो जो हमारी ही तरफ़ आ रहा हो।

तो बस, जून की एक ऐसी ही तपती हुई दोपहर में घेर लिया हम बच्चों ने रामू काका को। सबने बारी-बारी से ज़िद की कहानी सुनाने की। 

काका बोले, "बच्चो, मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है। बिना मेहनत कुछ नहीं मिलता। अब जैसे ..."

काका की बात पूरी होती, उससे पहले ही एक मज़ेदार बात हो गई। जानते हो, क्या हुआ?

हुआ यह कि रामू काका जैसे ही कहानी सुनाने बैठे, उनके सिर पर लद्द से आ गिरा एक आम। काका घबराए। हम सब चौंके। आम सिर से लुढ़कता हुआ गिर पड़ा उनकी गोद में, जिसमें धूप का चश्मा लगाए बैठी थी मेरी सबसे छोटी बहन, मुन्नी। 

मुन्नी ने आम उठाया, परखा। आम थोड़ा फट गया था। उसमें से रस बह रहा था। 

मुन्नी ने रस चखा। ख़ुशी से बोली, "मीथा!" फिर रामू काका के कन्धे का सहारा ले कर खड़ी हुई और उनके गंजे सिर पर उँगलियाँ फेरीं। इससे पहले कि मैं उसे रोक पाता, मुन्नी ने उँगलियाँ कीं मुँह के अन्दर, और फिर बोल उठी, "मीथा!"

लल्ली, मेरा भाई, और मैं हँस पड़े। मेरा भाई बोल उठा, "आप तो कह रहे थे कि मेहनत का फल मीठा होता है और बिना मेहनत किए कुछ नहीं मिलता, पर यहाँ तो बिना मेहनत ही फल मिला, और वह भी मीठा!"

"काका की पिप्-पिप् हो गई, काका की पिप्-पिप् हो गई!" लल्ली ख़ुशी में ताली बजाने लगी। 

"पिप्-पिप्, ताता पिप्-पिप्!" मुन्नी अपनी तोतली ज़बान में बोली।   

मुझे डर लगा। काका नाराज़ हो कर कहानी सुनाना बन्द कर दें, तो? ज़्यादा ग़ुस्सा हो गए, तो कौन जाने, शायद कभी कहानी न सुनाएँ। पर काका को जैसे मज़ा आ गया। बोले, "पच्चीस बरस से इसी पेड़ के नीचे लेटता आ रहा हूँ। इससे पहले कभी सिर पर तो क्या, पैर पर भी आम नहीं गिरा।"

कहना न होगा, उस आम को हमने उसी समय छील-छाल कर खा लिया। गुठली चूसती लल्ली और काले चश्मे से झाँकती मुन्नी के साथ हम दो भाई भी दोबारा ताकने लगे काका को आशा-भरी नज़रों से।

काका बोले, "बच्चो! जिस तरह यह आम गिरा, उस तरह पिछले पच्चीस साल में कोई दूसरा आम नहीं गिरा। फिर, यह गिरा भी, तो सिर पर चोट कर गया। और यह सोचो, अगर किसी ने आम का यह पेड़ न लगाया होता, इसे सींचा न होता, इसकी देखभाल न की होती, तो क्या आम लगते इसमें?"

हम सब चुप रहे। ऊपर, पेड़ पर बैठी कोयल ने ज़रूर कूक भरी। मानो काका की हाँ-में-हाँ मिला रही हो।

काका समझ गए कि बात हमारी समझ में आई तो, मगर पूरी तरह नहीं। बच्चो, आपके साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है न? चलिए, बताता हूँ कि काका ने आगे क्या किया।

काका ने मुन्नी को गोद से हटाया। सिर पर हाथ फेरा। ऊपर आम के पेड़ की ओर देखा। फिर, दूर किसी चीज़ को देखते हुए बोले, "यह सच्ची बात है, कोई कहानी नहीं। बात पुरानी है, बहुत पुरानी। एक दीवान साहब थे। सच बोलते थे। सबको प्यार करते थे, पर बड़े ग़ुस्सेबाज़ थे। घूसख़ोरी से दूर भागते थे, इसलिए दूध का दूध, पानी का पानी करते थे। पढ़े-लिखे कुछ ख़ास नहीं थे, लेकिन थे ग़ज़ब के अनुभवी। उनकी एक पुकार पर हज़ार लोग साथ चलने को तैयार हो जाते थे। अमीर नहीं थे। उनकी पत्नी बड़ी धर्म-कर्म वाली औरत थीं। मंदिर जाने वालीं, उपवास करने वालीं। कभी-कभी तो कई-कई दिन लगातार भी उपवास कर लेतीं।"  

"अरे, ऐसा तो गाँधी जी के साथ भी था। उनके माता-पिता भी तो ऐसे ही थे," मेरा छोटा भाई बोल उठा।

काका ने कहा, "ठीक कहा, छोटके! लेकिन गाँधीजी के पिता तो गुजरात में दीवान थे — पोरबंदर में, राजकोट में। मैं इस तरफ़ की बात कर रहा हूँ," बोलते-बोलते उन्होंने लल्ली को देखा। गुठली का रंग पीले से सफ़ेद हो चुका था, पर लल्ली थी कि अब भी गुठली चूसे जा रही थी।

"दीवान साहब के दोनों लड़के गाँव की पाठशाला जाते। गाँव की पढ़ाई तो गाँव की पढ़ाई होती है। फिर, पढ़ने वालों की भी तो रुचि होनी चाहिए! मास्टर पहाड़े सिखाते। कुछ बच्चे पहाड़े सीखते, कुछ गाली देना सीखते। कुछ लड़ते-झगड़ते। कुछ पीछे बैठ कर खेलते।"

मैंने सोचा, हमारे स्कूल में भी तो कुछ-कुछ ऐसा ही होता है। बच्चो, क्या आपकी क्लास में भी ऐसा ही होता है?

अच्छा चलिए, देखिए आगे, काका ने क्या कहा! बोले, "दीवान साहब का बड़ा लड़का, राम, पढ़ने से जी चुराता। आम के टिकोरे गिराता, कौओं के अण्डे चुराता, गिलहरियों पर गुलेल चलाता, और गाय का दूध दुह कर कच्चा ही पी जाता। छोटा लड़का, लक्ष्मण, भी भाई की देखा-देखी करता। यानी दोनों भाई पढ़ते कम, मटरग़श्ती ज़्यादा करते।"

मुन्नी को पता नहीं क्या समझ में आया, ख़ुश हो कर बोली, "मटल!" हमने ध्यान नहीं दिया। कहानी रफ़्तार जो पकड़ रही थी! काका ने कहानी आगे बढ़ाई।

"एक दिन मास्टर पगडण्डी पर जा रहे थे। सामने से छाता ताने दीवान साहब आ रहे थे। दोनों में न जाने क्या बात हुई, लेकिन उस शाम राम और लक्ष्मण को यह पता लग गया कि धूप और बरसात से बचाव करने के अलावा छाते का इस्तेमाल एक और तरह से भी होता है — छड़ी के तौर पर। दोनों की पिटाई हुई। दोनों रोए। मास्टर को कोसा। और दूसरे दिन स्कूल पहुँचे बदले हुए रूप में। लक्ष्मण सहमा हुआ, राम नाराज़। लक्ष्मण पहाड़े याद करने लगा। उस ज़माने में बहुत तरह के पहाड़े होते थे। सवा का, डेढ़ का, पौन का, ढ़ाई का — लक्ष्मण सिर हिला-हिला कर, बदन झुमा-झुमा कर पहाड़े रटता। अक्षर पहचानना, लिखना भी सीख गया। राम अपने छोटे भाई को पढ़ता देखता, लेकिन मछली पकड़ने और पतंग उड़ाने के आगे पढ़ाई करना उसे वैसा ही लगता जैसे गर्मी में आइसक्रीम खाने की जगह भट्ठी के सामने बैठ कर बाटी चबानी पड़े। मास्टर ने उसकी शिक़ायत नहीं की। सोचा होगा शायद, कि दो भाइयों में से एक ने भी पढ़ाई शुरू कर दी, तो ठीक है। 
 
"लक्ष्मण हिसाब-किताब में दीवान साहब की मदद करने लगा। गुमाश्तों की चोरियाँ पकड़ में आने लगीं। दीवान साहब की मुश्किलें हल होने लगीं, पर उन्हें यह भी पता चल गया कि लक्ष्मण पढ़ाई में मन लगाता है जबकि राम जी चुराता है। उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए लक्ष्मण को शहर भेजा। राम गाँव में ही रहा। शहर जाकर करता भी क्या? काला अक्षर भैंस-बराबर था उसके लिए। 

"लक्ष्मण ने अच्छी पढ़ाई की। अच्छी क्या, बहुत अच्छी! बेचारे दीवान साहब ने जोड़-जोड़ कर पैसे इकट्ठा किए। लक्ष्मण को विलायत भेजा पढ़ने। पर, लक्ष्मण को विलायत गए एक साल भी न गुज़रा होगा कि दीवान साहब परलोक सिधार गए। घर में बच गए राम, और राम की माँ। इधर दीवान साहब की आँखें मुँदीं, उधर तग़ादा करनेवालों की भीड़ लग गई। हर कोई कर्ज़ लौटाने के तग़ादे करने लगा। जिसने कुछ न दिया था, उसने भी माँगा; और जिसने सौ दिए थे उसने हज़ार माँगे। माँ पहले देवताओं के आगे हाथ जोड़ती थीं, अब अच्छे-बुरे आदमियों के आगे गिड़गिड़ाने लगीं। राम तो लिख-लोढ़ा पढ़-पत्थर था, भला लक्ष्मण को ख़ुद कैसे चिट्ठी लिखता? उसने न जाने क्या कहा और दरअसल क्या संदेश भेजा गया, पर लक्ष्मण तीन साल तक वापस नहीं आया। और जब वापस आया, तब तक गाँव से राम और उसकी माँ का नामोनिशान मिट चुका था। कहाँ तो लक्ष्मण यह अरमान लिए आया था कि पिता उसे गले लगा लेंगे, माँ आँचल की छाँव में स्नेह देंगी, और भाई गाँव के ताल-तलैया दिखाएगा; और कहाँ उसे मिले वे लोग, जो प्यार से मिलना तो दूर, उसके अपनों का पता बताने तक को तैयार नहीं थे।" 

"हाय राम! फिर तो बड़ी परेशानी हुई होगी?"

"हाँ! लेकिन लक्ष्मण कोई साधारण आदमी थोड़े-ही था? परिश्रम से पढ़ाई कर उसका दिमाग़ तेज़ हो गया था। पहले तो वह आसपास के गाँवों में भटका, फिर अगल-बगल के शहरों में गया, बाद में उसने कलकत्ता में वकालत शुरू की। उसकी वकालत चल निकली। उसने न पढ़ाई से जी चुराया था, न वकालत से जी चुराया — परिश्रम करता गया, और उसका फल भी उसे मिलता गया। उसके दिल में बस एक ही मलाल था — अपनी माँ और भाई से न मिल पाने का। उसके पास कोई तस्वीर तक नहीं थी उनकी, कि गुमशुदा के पोस्टर ही छपवा देता।

"एक दिन लक्ष्मण के दिमाग़ में एक आइडिया आया। उसने हर साल गाँव में भोज का आयोजन शुरू किया। फ़्री, जो जितना चाहे, खाए। धीरे-धीरे भोज के साथ मेला भी लगने लगा उसके पिता के नाम पर। लक्ष्मण वकालत में मसरूफ़ियत के बावजूद पूरे भोज के दौरान गाँव में रहता। अंत में ज़रूरतमंदों को कपड़े, बर्तन देता। उसका ख़याल था, दीवान साहब के नाम के मेले की बात उसके भाई और माँ से छुपी नहीं रहेगी। जैसे ही उन्हें पता चलेगा, वे मेले में आएँगे ज़रूर। और हुआ भी ऐसा ही। लेकिन किस तरह?"

रामू काका फिर आसमान की ओर ताकने लगे। लल्ली के हाथों से गुठली फिसल गई। मेरे भाई का मुँह खुला रह गया। मैं सिर खुजलाने लगा। बोली तो सिर्फ़ मुन्नी, "किछ तलह?"

रामू काका संसार में जैसे वापस लौट आए। बोले, "एक दिन भोज ख़त्म हुआ। लक्ष्मण ने कपड़े-लोटे भी बाँट दिए। पीठ घुमाई ही थी कि देखा, दो ग़रीब दूर खड़े हैं, आपस में सकुचाए से। इशारे से पास बुलाया तो ग़रीब सकुचाते हुए आए। जब पास आए, तो लक्ष्मण पर जैसे बिजली गिर पड़ी। अजीब दृश्य था! एक तरफ़ था सिल्क के कुर्ते, क़ीमती धोती और रेशमी दुशाले में सजा लक्ष्मण, और दूसरी तरफ़ थी फटी साड़ी में गाँठें लगाए उसकी माँ, बोरी पहने उसका बड़ा भाई। माँ की आँखों से गंगा-जमुना बह निकली। राम की आँखों के आगे उसका पूरा बचपन किसी फ़िल्म की मानिंद घूम गया। 

"लक्ष्मण उन्हें अपने साथ कलकत्ता ले गया, पर राम की ग्लानि न गई। लक्ष्मण के घर बिताया हर पल उसे अपने बचपन की लापरवाही पर कचोटता। अंत में एक रात वह बम्बई की ट्रेन पर बिना बताए बैठा, और इलाहाबाद उतर गया। किसी के घर माली का काम किया, किसी के घर गाय की देखरेख का। अब वह चाहे खेत में खुरपी चलाए या गाय दुहे, यही सोचता है कि हर किसी को परिश्रम करने का संदेश देगा, ख़ास कर बच्चों को।"

"अच्छा! तो वह अब भी है, रामू काका? लक्ष्मण उसे खोज नहीं पाया?" मेरे छोटे भाई ने हैरत से पूछा। 

"वह है तो, पर लक्ष्मण उसे खोजता कैसे? उसके बारे में किसी को पता ही नहीं है," रामू काका ने जवाब दिया।

"जब किसी को पता नहीं, तो आपको कैसे पता है? कहीं वह राम आप ही तो नहीं, रामू काका?" मेरे मुँह से अनायास निकल गया। 

रामू काका ने गमछे से आँखें पोंछीं। कोई उत्तर न दिया। 

लेकिन उत्तर मुझे मिल गया था। उनकी गीली आँखों से, परिश्रम करने के उनके संदेश से। अक़्सर सोचता हूँ, अगर रामू काका ने भी परिश्रम किया होता, तो उन्हें भी भाई और माँ का प्यार मिलता, उनकी ज़िंदगी भी चैन से कटती। 
हाँ, एक गड़बड़ ज़रूर हो जाती — यह कहानी न लिखी जाती!

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