रक्तबीज - भाग -1

03-05-2012

रक्तबीज - भाग -1

महेशचन्द्र द्विवेदी

भाग - 1

मैं, हरिहरनाथ कपूर (छद्‌मनाम), एयर इंडिया की फ्‍लाइट पर असहज भाव से बैठा ’कादम्बिनी’ पत्रिका में ’रक्तबीज’ शीर्षक से लिखा लेख पढ़ रहा था। यह पत्रिका मैंने सामने की सीट के पीछे लगे झोले में से निकाली थी और यूँ ही इसके पन्ने उलटने लगा था। शीर्षक में नवीनता लगी अत: मैंने पूरा लेख पढ़ डाला। लेख श्री मार्कंडेयपुराण के आठवें अध्याय में देवी माहात्म्य के अंतर्गत ’रक्तबीज-वध’ नामक वर्णन पर आधारित था :-

"मातृगणों से पीड़ित दैत्यों को युद्ध से भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोध में भरकर युद्ध के लिये आया। उसके शरीर से जब रक्त की बूँद पृथ्वी पर गिरती, तब उसी के समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वी पर पैदा हो जाता। महासुर रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्रशक्ति के साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्री ने अपने बज्र से रक्तबीज को मारा। बज्र से घायल होने पर उसके शरीर से बहुत सा रक्त चूने लगा। उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदें गिरी, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीज के समान ही वीर्यवान, बलवान और पराक्रमी थे। इस प्रकार उस महादैत्य के रक्त से प्रकट हुए असुरों द्वारा सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया। इससे देवताओं को उदास देख चण्डिका ने काली से कहा, "चामुण्डे। तुम अपना मुख और भी फैलाओ तथा मेरे शस्त्रपात से गिरने वाले रक्त बिन्दुओं को खा जाओ। यों कहकर चण्डिका देवी ने शूल से रक्तबीज को मारा और ज्यों ही उसका रक्त गिरा त्यों ही चामुण्डा ने उसे अपने मुख में ले लिया। इस प्रकार शस्त्रों से आहत एवं रक्तहीन होकर रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा।"

मेरे जैसे आधुनिक विचारों वाले वैज्ञानिक को लेख कल्पना की उड़ान-मात्र लगा और उसके समाप्त होते-होते मेरा ध्यान पुन: अपने वर्तमान पर खिंच गया। उस समय मुझे लग रहा था कि यह संसार सुख का अथाह सागर है जिसमें अपनी इच्छानुसार तैरने को मुझे छोड़ दिया गया है। दो माह पहले ही मैं इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नोलोजी से कम्प्यूटर में एम.टेक. करने के उपरान्त माइक्रोसौफ्‍ट लिमिटेड कम्पनी (छद्‌मनाम) के द्वारा चुना गया था और मुझे न्यूयार्क स्थित कार्यालय में 16 जुलाई, 1993 से नियुक्ति का आदेश दिया गया था। यह कम्पनी मेरे साथ के सभी अभ्यर्थियों के लिये ’ड्रीम-कम्पनी’ थी और केवल मैं अकेला ही चुनाव में सफल हुआ था। मेरे उच्चस्तर के साक्षात्कार के अलावा मेरा आई.आई.टी. का ’गोल्ड-मेडलिस्ट’ होना भी मेरे चुने जाने में सहायक था। मेरी फ्‍लाइट दिल्ली से लंदन को जा रही थी। मेरे हवाई जहाज पर यात्रा करने और विदेश जाने दोनों का यह प्रथम अवसर होने के कारण प्रत्येक दृश्य अथवा घटना के प्रति मेरी इंद्रियाँ उसी प्रकार सचेत थीं जैसे एक शिशु की इंद्रियाँ उसके जीवन में घटित होने वाली किसी नवीन घटना को आत्मसात करने को होती है। हवाई जहाज की खिड़की पर लगी सीढ़ियों पर चढ़ने पर जैसे ही मैंने आँख उठाई थी तो अप्सरा समान एक सुंदरी को नमस्ते की मुद्रा में मेरा स्वागत करते पाया था। मैं उसके नख-शिख, वेश-भूषा देखता ही रह गया था कि उस सुंदरता की मूर्ति के मुख से पुष्प सम झरते शब्द मेरे कानों को सुनाई दिये थे, मेरी नासिका में महकने लगे थे और मेरे नेत्रों को दिखाई दिये थे, "कृपया बोर्डिंग-पास दिखायें।" मेरा सीट नम्बर देखकर उसने मुझे मेरी सीट इंगित कर दी थी और मैं भौंचक्का सा वहाँ आकर बैठ गया था।

उसी परिचारिका, जिसे मेरे मन ने अप्सरा नाम दे दिया था, के द्वारा आपात्कालीन स्थिति में आक्सीजन मास्क नाक पर लगाने, पैराशूट पहनने एवं आपात्‌-द्वार द्वारा बाहर निकलने की प्रक्रिया समझाने पर मेरा ध्यान उसके नख-शिख निरीक्षण तक सीमित रहा था; मैं उसके द्वारा बताई गई प्रक्रिया को कुछ भी न समझ सका था। हवाई जहाज के उड़ान भरने से पूर्व उसके इंजिन की चिंघाड़ जैसे-जैसे बढ़ी थी, मेरे हृदय की धड़कन उसके समताल पर बढ़ी थी, परन्तु वांछित ऊँचाई पर पहुँचने पर उसकी ताल व लय में बहुत कुछ समरसता आ गई थी और मैं पहले से अधिक सहज हो गया था। तब मैंने अनुभव किया कि मेरे से अगली पंक्ति में मेरी सीट से बाँयी ओर बैठे दो गोरे व्यक्ति मेरी ओर यदा-कदा चोर निगाहों से देखकर गुपचुप बातें करने लगते थे। उनकी इन निगाहों से अपना ध्यान हटाने के लिये ही मैंने ’कादम्बिनी’ उठा ली थी और ’रक्तबीज’ शीर्षक लेख पढ़ डाला था। तभी ’अप्सरा’ एक ट्रे में ’टॉफी’ लेकर आ गई थी और मैंने सकुचाते हुए चार टॉफियाँ उठा ली थी। उनका रसा-स्वादन करते हुए मैंने फिर पाया कि वे दोनों व्यक्ति पता नहीं क्यों मुझमें आवश्यकता से अधिक रुचि ले रहे हैं। उनकी यह हरकत मुझे पसंद नहीं आ रही थी परन्तु आपत्ति उठाने का न तो कोई स्पष्ट कारण उपलब्ध हो पा रहा था और न मेरा ’मूड’ था। फिर भी मेरी शेष यात्रा के दौरान नवीन दृश्यों को देखने एवं यदा-कदा ’अप्सरा’ के लुके-छिपे दर्शन का आनंद लेने में इन दो यात्रियों द्वारा बार-बार मुझे देखना बाधा डालता रहा था।

हीथ्रो एयरपोर्ट पर वीसा एवं कस्टम्‌स अधिकारियों से छुट्टी पाकर जैसे ही मैं लाउंज में निकल रहा था कि वे दोनों व्यक्ति मेरे सामने आ गये और उनमें से एक अंग्रेज़ी में बोला कि हमारे साथ आइये। मैं यह सोचकर कि शायद कुछ बची हुई प्रक्रिया की पूर्ति हेतु मुझे बुलाया जा रहा होगा, मैं उनके पीछे चल दिया। एकांत में स्थित एक कमरे का ताला खोल कर वे मुझे अंदर ले गये और एक कुर्सी पर बैठने को कहा। उन्होंने मुझसे मेरा पास-पोर्ट लेकर उसका भली-भाँति अध्ययन किया और फिर मेरे विषय में मुझसे कई प्रश्न किये। उनके हाव-भाव से लग रहा था कि वे मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। फिर उन्होंने मेरे सामने मेज पर रखे कम्प्यूटर की कुछ ’कीज़’ (बटन) को दबाया और उसके ’स्क्रीन’ का गहराई से अध्ययन करने लगे। उनमें से एक ने कहा "क्या मैं अपने द्वारा बताये परिचय के विषय में निश्चित हूँ?" मेरे हाँ कहने और माइक्रोसौफ्‍ट कम्पनी अथवा भारत में मेरे विषय में पूछताछ कर पुष्टि कर लेने को कहने पर उन्होंने कहा कि उनके पास पुष्टिकरण के लिये उससे अधिक आसान व विश्वसनीय साधन उपलब्ध हैं यदि मैं अपनी उँगलियों के निशान उन्हें देने में आपत्ति न करूँ। मैंने तुरन्त अपनी सहमति दे दी और उन्होंने मेरे ’फिंगर-प्रिंट्‌स’ लेकर कम्प्यूटर में ’फीड’ कर दिये। कुछ ही सेकंडों पश्चात्‌ कम्प्यूटर पर जो लिखकर आया, उसे देखकर उनके मुख पर सफलता का भाव झलका और उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा, "यू आर अंडर अरेस्ट, बिल। (बिल! आपको बंदी बनाया जाता है)।" 

यह सुनकर मुझ पर तो जैसे वज्रपात हो गया, मेरी समस्त प्रसन्नता एवं जोश ग्रीष्म ऋतु की सूर्य की तीव्र-किरणों के सामने पड़ती ओस की बूँदों के समान भाप बनकर उड़ गये और मेरा गला सूखने लगा। फिर भी मैने साहस बटोर कर कहा, "मैं बिल नहीं हूँ और मैंने कोई अपराध भी नहीं किया है। आपको कोई भ्रम हुआ है।" 

इस पर उनमें से सीनियर सा दिखने वाला व्यक्ति बोला, "हम दोनों इंटरपोल से सम्बन्ध रखते हैं। मेरा नाम ऐल्बर्ट है। आपके नाम इंटरपोल का इंटरनेशनल वारंट है। आप बिल ही है जैसा कि आपको देखकर हमें शक था और जो आपके फिंगर-प्रिंट्‌स के मिलान से साबित हो गया है।" 

मैंने उनसे अपने विषय में पुन: जानकारी करने का अनुरोध किया तो वे बोले, "मिस्टर बिल, आप पुलिस को पहले भी झाँसा दे चुके हैं। परन्तु इस बार आपकी पहचान के विषय में हमने अन्य जाँच की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है। आप को आगे जो भी कहना है, कोर्ट में कहियेगा।" 

वे मुझे वहाँ से कोर्ट ले गये जहाँ पर कोर्ट ने मेरे से सम्बन्धित प्रपत्र देखने के बाद मुझे न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।" पाँच दिन तक ठंडी जेल की यातना सहने के बाद मुझे बताया गया कि मेरी प्रभावशाली पत्नी फ़ियोना ने मेरी जमानत तो करवा ली है परन्तु मेरे पूर्व आपराधिक रिकार्ड को देखते हुए फ़ियोना को निर्देश दिया गया है कि मैं घर पर पूर्णत: नज़रबंद रहूँगा और मुझे अपने वकील के अतिरिक्त किसी बाहरी व्यक्ति से किसी प्रकार का सम्पर्क करने की अनुमति नहीं होगी। इन आदेशों का पालन सुनिश्चित करने का पूर्ण उत्तरदायित्व फ़ियोना पर होगा और अवज्ञा की दशा में उस पर एक अंतर्राष्ट्रीय जालसाज को फरार कराने में सहायता करने का आरोप लगाया जा सकता है। मेरे साथ पिछले पाँच दिन में घटी अनपेक्षित घटनाओं और जेल की यातनाओं ने मेरी संज्ञा को इतना कुंठित कर दिया था कि मैंने बिना कोई प्रतिवाद किये यह सूचना सुन ली।

- क्रमशः

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कविता
कहानी
सामाजिक आलेख
बाल साहित्य कहानी
व्यक्ति चित्र
पुस्तक समीक्षा
आप-बीती
हास्य-व्यंग्य कविता
विडियो
ऑडियो