किसी को सता कर जिये तो क्या जिये,
किसी को रुला कर जिये तो क्या जिये
 
करता रहा तुम पर भरोसा अटूट हर पल,
उसी को आज़मा कर जिये तो क्या जिये
 
की ज़िंदगी की जमा-पूँजी नाम तुम्हारे,
उसे घटिया बता कर जिये तो क्या जिये
 
जिसकी अश्रुधार बहे सिर्फ़ तुम्हारे ही लिए,
उसे नज़रों से गिरा कर जिये तो क्या जिये
 
किया जो कुछ, सब तुम्हारी ख़ुशी के लिए,
उसी का दिल दुखा कर जिये तो क्या जिये
 
लहू के रिश्ते जैसा ही रिश्ता था जब उससे 
रिश्ते में दाग़ लगा कर जिये तो क्या जिये

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें