मंगल की चतुराई

नीरजा द्विवेदी

एक लाल मुँह का बंदर था जिसका नाम था मंगल। वह अपनी पत्नी मीनू के साथ पीलीभीत के जंगल में रहता था। वह बहुत खुशमिज़ाज और चतुर था पर उसमें एक बुराई थी कि वह आलसी बहुत था। आज की बात कल पर टाल देता था। जंगल के राजा शेर को छोड़कर उसका सबसे भाईचारा था। कभी वह खरगोशों के साथ खेलता तो कभी हाथी के साथ। कभी भालू दादा के साथ शहद की मक्खी के छत्ते से शहद का स्वाद चखता तो कभी जंगली भैंसों के बच्चों के साथ उछल–कूद करता। हिरन के झुंड से तो उसकी दाँतकाटी दोस्ती थी क्योंकि वह पेड़ पर चढ़कर शेर के आने के पहले उसे देख लेता और हिरनों को सावधान कर देता था। बहुत हँसे-ख़ुशी से मंगल और मीनू के हँसते-गाते दिन बीत रहे थे। इसी बीच मीनू माँ बनने वाली थी। भालू दादा ने मंगल को समझाया कि बरसात के दिन आने वाले हैं अतः तुम अपने लिये घर बना लो। बच्चे हो जाने पर परेशानी होगी। मंगल ने भालू दादा की बात सुनकर इस कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया और मीनू के साथ लारी-लप्पा, लारी-लप्पा करते नाचता गाता रहा। खरगोश, हिरन, हाथी, बया। मोर सभी ने मंगल को समझाया कि कोई न कोई जगह खोज लो पर उसने किसी की न सुनी। 

देखते-देखते बरसात शुरू हो गई। मंगल अभी बारिश की हल्की फुहारों का आनंद ले ही रहा था कि मीनू को दर्द शुरू हो गया। अब तो मंगल की हवा बैरंग हो गई। उसे समझ में नहीं आया कि क्या करे? उसकी दोस्त फौक्सी लोमड़ी ने मंगल को बताया कि पहाड़ी के ऊपर एक शेर की गुफा है। मुझे मालूम है कि एक माह से शेर इस गुफा में रहने नहीं आया है। आज तो तुम उसमें चले जाओ और अपना काम चला लो पर शीघ्र ही अपना दूसरा प्रबंध कर लेना। शेर का पता नहीं कब वापस आ जाये। 

मंगल ने फौक्सी लोमड़ी को धन्यवाद दिया और शेर की गुफा में शरण ली। मीनू ने दो जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया। सुबह उठकर मीनू ने दूसरी जगह खोजने को कहा पर मंगल मस्त बैठा रहा। इसी तरह आठ दिन बीत गये। अब तो मंगल निर्द्वंद्व हो गया। उसे लगा कि शेर यहाँ क्या आयेगा? कुछ दिन और बीते और एक दिन शाम को जब बारिश तेज़ हो रही थी वह जंगल शेर की दहाड़ से गूँज उठा। बारिश से बचने के लिये शेर को अपनी गुफा याद आ गई और वह अपनी गुफा की तरफ़ आने लगा। अब क्या था मंगल की रूह काँप उठी! वह सोचने लगा कि इतनी तेज़ वर्षा में वह मीनू और बच्चों के साथ कहाँ जाये? मंगल चतुर तो बहुत था ही। उसने जल्दी से अपनी सबकी जान बचाने का एक उपाय सोच लिया। वह मीनू से बोला, “मीनू जब शेर नगीच पहुँचैगो, मैं तुम्हाये ताईं इसारा कर देउँगो तबै तुम बच्चन के चिकोटी काट के रुलाय दियौ। मैं पूछौंगो कि "बच्चा काहे रुवाय रही हो”? तबै तुम कहियो कि "बच्चा सेर को माँस खान कै ताईं रोवत हैं।" 

शेर जब गुफा के नज़दीक आता मालूम दिया तो उसने मीनू को इशारा कर दिया। मीनू ने उसके कहे अनुसार बच्चों को ज़ोर से चिकोटी काट ली। इस पर बच्चे ज़ोर से रोने लगे। अब मंगल ने एक बाँस के टुकड़े को मुँह से लगाकर भारी आवाज़ बना कर कहा,  “मीनू! बच्चा काहे रोवत हैं?"

मीनू ने उत्तर दिया, “बच्चन के ताईं भूख लागी है। सेर के माँस खान कै ताईं जिद करत हैं।"

मंगल ने फिर पूछा, “मैने सकारे भैंसा मारो हो सो बच्चन के ताईं खवाय देव।"

मीनू बोली, “बा भैंसा तो बच्चा पहलेई चट कर गये। अब तौ वे सेर के माँस खान कै ताईं जिद पकरे हैं।”

मंगल बोला, “चिंता न करौ। पास ही सेर बोल रहो ह्है। मैं अबै जात हौं और सिकार करके लावत हौं।"

शेर ने यह सुना तो सोच में पड़ गया। जिसके बच्चे शेर का माँस खाना चाहते हैं और सुबह भैसे का माँस चट कर चुके हैं तो यह ज़रूर ही कोई भयंकर जीव है। सोच-विचार करके उसने वापस लौटना ही उचित समझा।

शेर जब वापस लौट रहा था तब रास्ते में उसे शेरनी मिल गई। शेर को गुफा की तरफ़ न जाते देखकर बोली, "का भओ वनराज? इती बारिस मैं तुम गुफा मैं काहे नहीं जात हौ?" 
शेर बोला, “रानी! तोसै मैं कहा कहूँ? अपनी माँद किसी जबरा नै कब्जयाय लई है। बाके बच्चा भैसा चट कर जात हैं और सेर को माँस खान की जिद करत हैं।"
शेरनी बोली, “तुम डरपो मती। हम दोऊ चल के देख लैं कि माजरा का हौ?"

उधर मंगल भी सतर्क था। वह समझता था कि शेर चुप नहीं बैठेगा और वापस आयेगा। उसका अंदाज़ा सच निकला। शेर शेरनी के साथ आते दिखाई दिया। उसने जल्दी से मीनू को फिर वही क्रिया दोहराने को कह दिया। जैसे ही शेर और शेरनी गुफा के समीप आते दिखे मंगल ने मीनू को इशारा कर दिया। अब क्या था मीनू ने बच्चों को ज़ोर से चिकोटी काट के जगा दिया। बच्चे भी बार-बार चिकोटी काटे जाने से चिढ़ कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। मंगल ने बाँस का टुकड़ा मुँह से लगाकर ज़ोर से कहा, “अरे बच्चन कौ काहे रुवाय रही हौ?"

मीनू बोली, “बच्चा मान्त नाहीं। जिद किये हैं कि सेर को ही माँस खयैं।"

मंगल बोला, “धीरज धरौ और चुप्पा रहियो सेर और सेरनी दुइ जने आवत हैं। अब तौ सबै की भूख मिट जैहै।"

यह सुनकर शेर और शेरनी वापस लौट गये। उन्होंने उससे उलझना ठीक नहीं समझा।

मंगल ने उस दिन अपनी चतुराई से अपनी और परिवार की जान बचा ली पर उसकी समझ में आ गया कि आलस करना और समय पर कार्य न करना कितना घातक हो सकता है? दूसरे ही दिन सुबह उठकर उसने पहला काम यह किया कि अपने लिये एक खंडहर में रहने की सुरक्षित जगह खोज ली और अपने परिवार के साथ वहाँ चला गया।
 

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