सरेंडर पॉलिसी
श्यामल बिहारी महतो
मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि अपनी सर्विस काल में कभी चुनाव डियूटी में भी जाना होगा और कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान कराने का एक अहम रोल निभाना होगा। कहा जाता है कि होनी और अनहोनी के बीच ही मनुष्य अपने जीवन का सफ़र तय करता है। मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ था। चुनाव डियूटी में जाना मेरे लिए यातना शिविर में दी जाने वाली किसी सज़ा से कम नहीं थी।
हालाँकि इस बार नक्सली संगठनों की ओर से जब चुनाव बहिष्कार की घोषणा अंतिम समय तक नहीं हुई तो उस क्षेत्र के लोगों ने राहत की साँस ली थी। डरे हुए चेहरों पर आशा की एक नई किरण-सी देखने को मिली थीं। क्षेत्र की अधिकांश जनता चुनाव के पक्ष में थी। पर खुलकर और चुनाव के पक्ष में कोई आगे आने को तैयार नहीं था। नक्सली ख़ौफ़ घरों के साथ-साथ दिलों में भी समाया हुआ था।
कहा जाता है उस क्षेत्र में नक्सलवाद का उदय अचानक नहीं हुआ था। अचानक कुछ होता भी नहीं है, हर मूवमेंट के पीछे एक बड़ा कारण भी छुपा होता है। भूख और बेरोज़गारी ने उस क्षेत्र में उग्रवाद को रोपने का काम किया था। और सरकार की उदासीनता और उसकी दोहरी नीति ने उस पर खाद-पानी डालने का काम किया था। लोग यहीं से सरकार और उनकी दोषपूर्ण नीतियों के विरुद्ध होते चले गए थे। नब्बे के दशक के बाद से ही दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में धीरे-धीरे अलगाववादी संगठनों के पाँव जमने शुरू हो गये थे। इसका असर सीधे-सीधे मत और मतदान केंद्रों में भी पड़ना शुरू हो गया था। मतदान केंद्रों में मतदाता कम आने लगे। बम-बारूद का डर लोगों को सताने लगा। रात के अँधेरे में स्कूल और घर की दीवारों में मत बहिष्कार संबंधित पोस्टर चिपके होते। किसी-किसी में लिखा होता, “पहला वोट, पहली गोली” इतना ही नहीं किसी-किसी पोस्टर में यह भी लिखा होता “वोट डालने वालों को दो इंच छोटा कर दिया जायेगा” लोगों ने मतदान केंद्रों पर जाना छोड़ दिया। जान है तो जहान है। आगे चलकर इसने वोट बहिष्कार का रूप ले लिया। वोट का सीज़न आते ही लोग घरों में दुबक जाते। सुना गया एक बार बम बारूद विस्फोट कर कोनार डैम पुल को भी क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की गई थी। चुनाव के दौरान मतदान कराने जा रहे वाहनों को डायनामाइट से उड़ाने की ख़बरें भी बीच-बीच में उड़ती रहीं।
इस तरह वोट बहिष्कार के कारण जनप्रतिनिधि भी उन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में क़दम रखने से डरते थे। सो क्षेत्र का विकास भी रुका पड़ा था । सड़क, पुल, पुलिया सभी का कबाड़ा हाल था। इस क्षेत्र के हर गाँव में जैसे नक्सलियों का क़ब्ज़ा था। कोई उनके विरुद्ध मुँह खोलने से डरते थे। शाम होते ही नक्सली गाँव में घूमते नज़र आते। कंबल ओढ़कर बदलते हालात का जायज़ा लेते। पिछले तीन चुनाव में गाँव में एक भी वोट नहीं पड़ा था। कहाँ तक सच है, दस साल पहले लोक सभा चुनाव में कुछ युवाओं ने वोट डालने की हिम्मत की थी, उसी रात दो युवाओं के उठा ले गए थे नक्सली, तब से गाँव में एक भी वोट नहीं पड़ा था।
परन्तु कब तक? युवा परेशान थे, बंदूक राज व्यवस्था से अब वे भी ऊब चुके थे और अब वे बदलाव चाहते थे। उन्हें शिक्षा और रोज़गार चाहिए था। और यह बंदूक के बल पर सम्भव नहीं था। यह वोट से ही हासिल हो सकता था। किसानों को खेती के लिए हल-बैल और बीज चाहिए होता है। लेकिन उसकी जगह उनके हाथों गोली-बंदूक पकड़ा देने से वो खेती नहीं कर सकते। बहुत से नक्सली युवा भी बीहड़ों के जीवन से ऊब चुके थे। उन्हें शिक्षा, रोज़गार और एक सुकून का जीवन चाहिए था। और यह उसे समाज की मुख्यधारा से जुड़ने पर ही मिल सकता था। क्षेत्र में भी सड़क, पुल, पुलिया. और रोज़गार की माँग उठने लगी थी। वक़्त तेज़ी से बदल रहा था। अलगाववादी नक्सली अपने ही घरों में अलग-थलग पड़ने लगे थे। उनके घरों में जिस चूल्हे पर खाना पकता था, वहीं से अब शिक्षा, रोज़गार और भविष्य का धुआँ उठने लगा था, “इस तरह की जिन्दगी का कितना भरोसा? तोर बाद हमनी के की गति होतय . . .? थाना में बंदुकवा काहे नाही जमा कर देहक, सरकार पैसा भी देतो और रोजगार भी।” रोटी के साथ-साथ पत्नियाँ उनके सामने भविष्य भी परोसने लगी थीं। क्षेत्र के बदलते हालात को नक्सलियों ने भी भाँपना शुरू कर दिया थाअ। उनकी समझ में भी यह बात आ गयी थी कि उनका बंदूक-राज ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं है। अब वो भी बंदूक-पॉलिसी की जगह सरेंडर-पॉलिसी को ज़्यादा महत्त्व देने लगे थे। बहुतों ने तो राजनीति की मुख्य धारा से भी जुड़ने का मन बना लिया था। अँधेरे को भी उजियारे की चाहत होती है।
पाँच साल बाद फिर चुनाव की तारीख़ घोषित कर दी गई थी। सोचा ये जा रहा था कि नक्सली फिर चुनाव बहिष्कार की घोषणा कर देंगे। लेकिन इस बार उधर से जब कोई अधिकारिक घोषणा नहीं हुई। न विरोध में न पक्ष में। तो जनता और पसोपेश में पड़ गई। जो डर था। डर बना रहा।
पचीस साल नौकरी करने के बाद अचानक से मेरी चुनाव डियूटी लगी थी। जाति विरोधी ऑफ़िस के बड़े बाबू ने ख़ुद का नाम काट मेरे नाम को आगे धकेल दिया था। अधिकारी से मिलकर मैंने विरोध जताया, पर कुछ हल न निकला, दोनों की मिली-भगत थी। पहले लोक सभा चुनाव में हिस्सा लेना पड़ा। शहरी क्षेत्र था। किसी बात का डर नहीं था। न किसी तरह की दिक़्क़त हुई थी। लेकिन विधानसभा चुनाव डियूटी में जाना इतना आसान नहीं था। सर पे कफ़न बाँधकर जाने जैसा था। बंदूक के साये में चुनाव डियूटी करना सहज नहीं होता। यह बात तब जाना, जब हम कलस्टर में पहुँचे और पता चला हमारी डियूटी गोमिया विधानसभा के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र में पड़़ी है। यह इलाक़ा अति संवेदनशील अर्थात् घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। फोन पर बेटे को जगह का नाम बताया। बताना भी ज़रूरी था। सुनकर वह भी कुछ चिंतित हो उठा। मैंने ढाढ़स बँधाया, “चिंता की कोई बात नहीं है, माँ की कृपा है मुझपर, कोई अनहोनी नहीं होगी!” पता नहीं यह दिलासा ख़ुद के लिए था या बेटे के लिए।
इससे दो दिन पहले बैंक जाकर मैंने बेटे का नाम ‘नोमिनी’ के रूप में अपने खाते में जुड़वा आया था। क्या भरोसा जीवन का आज हैं कल नहीं रहेंगे!
रह-रहकर मुझे पिछले चुनाव के वो वारदात याद आ रहे थे, जब एक पहाड़ी क्षेत्र में हेलीकाप्टर चुनाव कर्मियों को लिए जा रहा था और नीचे से नक्सली उस पर दनादन गोलियाँ बरसाने लगे थे। हमें तो बस लेकर जाने वाली थी। सो चिंता की चादर सबने ओढ़ ली थी।
मुझे याद है, कलस्टर से हमारी बस खुलने के पहले अपने गुरु भाई महेन्द्र को मैंने फोन किया था। उनके पिता जी हमारे बचपन के गुरु थे। महेन्द्र पटना में एक सरकारी विभाग में कर्मचारी था। मैं डरा हुआ था। उसे अपनी हालत और हालात दोनों बताए। देर तक वह मेरी बात सुनता रहा। वह उसी गाँव का था। जहाँ हमें जाना था। उसने बड़े इत्मिनान से कहा था, “दादा, डरने की कोई बात नहीं है, इस बार नक्सली चुनाव में कोई बाधा नहीं डालेंगे, गाँव में ऐसा कह दिया गया है। आप बेख़ौफ़ जाइए, बाक़ी चन्द्रदेव आपकी मदद करेगा, वह भी आपको जानता है, उसका फोन नंबर मैं आपको वाट्सैप करता हूँ . . . कोई बात हुई तो फ़ौरन हमें फोन कीजिएगा, नमस्कार!”
मैं राहत की साँस ले सकता था। फिर भी डर तो डर था। मन के एक कोने में बैठा रहा। मैंने बेटे को फिर फोन लगाया और महेन्द्र की बात बतायी। उसने झट से कहा, “यह बड़ी बात है बप्पा, मैं कहा करता था न कि नक्सली हालात के मारे होते हैं लेकिन है तो इंसान ही, अब चिंता की कोई बात नहीं है!”
सुबह आठ बजे कलस्टर से बस खुलनी थी। अभी खुली नहीं थी कि तभी टीम कप्तान मजिस्ट्रेट का मुँह खुल गया, “जिनको भी, पर-पखाना, पेशाब या फिर खाना-पीना करना हो, वो जल्दी-जल्दी कर लें, मतदान केंद्र पहुँचने के पहले बीच में बस नहीं रुकेगी, बाद में बोलना नहीं कि कहा नहीं गया था!”
“सर, हम चुनाव कराने जा रहे हैं कि जंग लड़ने, इतना सख़्त नियम . . .?” मैं चुप न रह सका।
“नक्सल प्रभावित क्षेत्र में चुनाव कराना जंग लड़ने जैसा ही होता है!”
“सर, अगर रास्ते में किसी का पेट ख़राब हो जाए और उसे पखाना जाना हो . . .?” एक अन्य बोल उठा, जो पेट से भरा-पूरा था।
“उसके लिए आपात बस लैंडिंग होगी, और कुछ?”
“नो सर, थैंक्यू सर!”
बस में सवार सभी हँस पड़े। माहौल ख़ुशनुमा हो उठा। लेकिन चुनाव डियूटी किसी जंग से कम नहीं होता यह सभी को मान लेना पड़ा था।
कलस्टर से बस चली तो एक साथ सभी ज़ोर से बोल उठे, “हर हर महादेव, हर हर महादेव . . .!”
मुझे अच्छा नहीं लगा। धार्मिक नारा हर जगह सही नहीं होता। न उन्मादी होना सही है। बस में सवार दूसरे समुदाय की भावनाओं का ख़्याल रखना भी अच्छे इंसान की पहचान होती है। ख़ैर बस चल पड़ी तो लगातार चार घंटे चलती रही। कोई विराम नहीं कोई अल्पविराम नहीं। अचानक नरकी मोड़ के आगे चीखती हुई सड़क के किनारे बस खड़ी हो गई। इसी के साथ, “आप लोगों के पास पाँच मिनट समय है, जल्दी से हल्का हो लीजिए!” मजिस्ट्रेट का आदेश गूँज उठा। सभी हड़बड़ा कर बस से नीचे उतरे और सर्र . . . सर्र पैंट का चेन खींचने लगे। घना जंगल शुरू हो चुका था। देखा सामने बीआईएसएफ़ जवान गश्त कर रहे हैं। अभी तक हमारी बस मात्र आधे दर्जन सुरक्षा बलों के साथ चल रही थी। पूछने से पता चला अब हमें पैरा मिलिट्री फ़ोर्स के साथ चलना होगा। इसीके साथ आगे-आगे मिलिट्री वाहन और उसके पीछे तीन-तीन बसें एक साथ आगे बढ़ी थीं। भूख भी लगी थी। लेकिन खाने का भी समय नहीं था। सब डरे और सहमे हुए बस की सीट से चिपक गए थे।
जैसे-जैसे मतदान केंद्र के नज़दीक हम आते जा रहे थे, डर का पारा मीटर उसी अनुपात बढ़ता जा रहा था। जैसे ही बसें कोनार डैम पार कीं अचानक से बसें रुक गई। बस की खिड़की से बाहर झाँका। विशाल डैम को दुबारा देखा। डैम में पानी आधा रह गया था। छह माह पहले जब मैं बचपन के गुरु जी से मिलने उनके गाँव चिलगो गया था तब इसी रास्ते से होकर गया था। तब डैम भरा पूरा था। गर्भवती महिला की तरह फूला फूला! हाँ रास्ता तब भी ख़राब था आज भी ख़राब था। लेकिन चिंता फ़िक्र की कोई बात नहीं थीं। तभी गुरु भाई महेन्द्र की बात कानों में गूँजने लगी थी, “दादा, मेरा घर पहुँचने में थोड़ी दिक़्क़त होगी। मामू लोग के कारण पिछले बीस सालों से रास्ते में कोई काम नहीं हुआ है। ज़रा सँभल कर बाइक चलाना . . .!”
आज भी हम उसी रास्ते, उसी चिलगो गाँव जा रहे थे। लेकिन चिंता और फ़िक्र से जूझता हुआ। जाने गाँव में किस तरह हमारा स्वागत हो, क्या पता अचानक से नक्सली ही आ धमकें? सड़क का पता नहीं, बड़े-बड़े बोल्डर रोड पर बिखरे पड़े थे, जगह-जगह गढ़े बन आये थे उसी पर बस हिचकोले खाते हुए आगे बढ़ रही थी और हम सब अपने माता-पिता को याद कर रहे थे। ऐसी बात भी नहीं थी कि डर केवल मुझे ही आ रहा था। बस में बैठे सभी सशंकित और भीतर से सहमे हुए थे। मेरे बग़ल में एक बाबू मोशाय तपन घोष भी बैठा था वो भी पोलिंग ऑफ़िसर था। कई बार मुझसे अपना डर बता चुका था, “कि होबेय महतो जी, नक्सली कहीं अचानक से?”
मैं चुप रहा, सभी लोग चुप थे। सिर्फ़ बसों की घिर्र-घिर्र की आवाज़ें आती रही थीं। अब बसें बीच गाँव में प्रवेश कर चुकी थीं। आगे की दो बसें आगे बढ़ गईं। सामने ही सड़क किनारे एक स्कूल के सामने, हमारी बस रुक गई। एक टीम उतरी। बस फिर आगे बढ़ी। तीन किलो मीटर चल कर बस फिर रुकी। बस के रुकते ही इस बार तड़तड़ा कर ज़ोर से पाँच-छह आवाज़ें हुई। यह गोलियों की आवाज़ें थीं या फिर पटाखों की, हम समझ नहीं पाए। डर से देह के साथ-साथ सभी की रूहें तक काँप गईं। चूहेदानी में फँसे चूहों जैसी हमारी हालत हो गई थीं। अगर नक्सलियों का यह प्लान है तो कोई नहीं बचेगा। बस में महज़ आधा दर्जन फ़ोर्स सवार थे। मजिस्ट्रेट “शाम को मिलेंगे” कह दूसरी बस से आगे निकल गए थे। आधे दर्जन फ़ोर्स हमारी रक्षा करेंगे कि अपनी! नेपाल का अमेरिका से लड़ने जैसा हाल! हम सभी आधे घंटे तक बस में दुबके रहे। जवानों ने भी अपनी-अपनी पोज़ीशन ले ली थी। लेकिन कोई हलचल नहीं, कोई सामने नहीं आया। डर चरम पर पहुँच चुका था। मन की शंका प्रबल होती चली गयी थी। तभी मुझे गुरु भाई महेन्द्र की याद आई। उसने वाह्ट्सैप में किसी चन्द्रदेव का नंबर भेजने की बात कही थी। वाह्ट्सैप खोला। सचमुच एक नंबर सेंड किया हुआ था। काग़ज़ में उस नंबर को नोट किया, फिर मोबाइल पर डाल कॉल लगा दिया, “मैं अभी हैलो! कहने ही वाला था, कि उससे पहले उधर से आवाज़ आई, “श्यामल दा, जोहार जोहार! आप पहुँच गए क्या . . .?”
“जोहार भाई, चन्द्रदेव बोल रहा है . . .?”
“हाँ दादा, मैं चन्द्रदेव ही बोल रहा है, आप सब पहुँच गए . . .?”
“हाँ, हाँ भाई, हम सब पहुँच गए हैं। कहाँ हो तुम? यहाँ सभी डरे हुए हैं। जल्दी आओ न!”
“हम पाँच मिनट में पहुँच रहे हैं, डरने की कोई बात नहीं है दादा!” चन्द्रदेव ने कहा और फोन काट दिया।
“कौन था?” एक जवान सामने आया।
“इसी गाँव के युवा है!”
इतने में ही दो मोटरसाइकिल पे सवार छह लड़के वहाँ आ पहुँचे। सब हमउम्र के थे। इसी बीच हम सभी बस से नीचे उतर आये थे। जवान भी नीचे आ गए थे। वे ख़तरों को सूँघ रहे थे और हम लड़कों में अपनी सुरक्षा ढूँढ़ रहे थे। इतने में एक लड़का आगे बढ़ कर मेरा पाँव छूकर प्रणाम किया। बोला, “आप ही श्यामल दा है न। फ़ेसबुक में आपका फोटो देखा था। तभी पहचान गया।”
“हम लोग यहाँ पहुँचे तब गोलियों जैसी तड़तड़ा कर आवाज़ें आई थीं। यह कैसी आवाज़ें थीं चन्द्रदेव . . .?”
“आप लोग डरे नहीं, निश्चित रहें, वो गोलियों की नहीं, पटाखों की आवाज़ थीं। वोट बहिष्कार नहीं हुआ, इस ख़ुशी में लड़कों ने पटाखे फोड़े हैं। कोई ख़तरा नहीं है। रिकार्ड वोट पड़ेंगे। बेफ़िक्र रहें आप सब। शाम को आऊँगा, बी ई लो आपके खाने का इंतज़ाम कर देंगी!” कह चन्द्रदेव पुनः मोटरसाइकिल पर जा बैठा, “दादा शाम को मिलता हूँ।”
हम सबने राहत की साँस लीं। सामने ही स्कूल था। सभी अपना अपना समान उठाने लगे थे।