मजबूरी
अशोक परुथी 'मतवाला'अस्पताल के 'बेड नंबर' 14 पर असहाय-सा, पीड़ा से बुरी तरह छटपटा रहा था वह! उसकी हालत बकरे के उस धड़ की तरह थी जो वार करने के पश्चात कटकर सिर से पूरी तरह अलग नहीं हुआ था। पुलिस की दो गोलियाँ उसके शरीर के दो भागों को छेद गई थीं, एक गोली उसे कन्धे के पास लगी थी और दूसरी टाँग में।
पिछले दो दिनों से करीम खाँ कहाँ पड़ा था, उसे कुछ ख़बर न थी। उसे लगाये गए दर्द के टीके का असर ज्यों-ज्यों घटता जा रहा था त्यों-त्यों उसकी पीड़ा बढ़ती जा रही थी। वह रह-रहकर बेबस कराह उठता था। उसे ऐसे महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर का ऊपरी भाग कूल्हे के नीचे के भाग से कट गया हो।
करीम खाँ को दिखाई दे रही तो सिर्फ़ रक्त की बोतल जो उसकी नज़रों के सामने पोल पर उल्टी लटकी हुई थी और जिससे क़तरा-क़तरा ख़ून उसकी नसों की तरफ़ बह रहा था। लगभग चार घंटे के आपरेशन के बाद उसके शरीर से डॉक्टरों ने दो गोलियाँ निकाली थीं।
सहसा, करीम खाँ ने महसूस किया कि उसके ईर्द-गिर्द कुछ हलचल सी होने लगी है। उसकी आँखें कुछ पल के लिए खुलीं और फिर स्वयं ही बंद हो गयीं। नींद की गोलियों के नशे की ख़ुमारी ने उसे एक बार फिर-से दबोच लिया था। इतने में एक नर्स दौड़कर डॉक्टर को बुला लायी थी। इंस्पेक्टर और उसका एक अन्य सहयोगी भी अपने स्थान को छोड़ कर उसके बिस्तर की और लपक पड़े थे। उन्हें भी बड़ी बेसब्री से करीम खाँ के जागने का इंतज़ार था ताकि वे उसके बयान ले सकें और अपनी पूछताछ करके मामले की जाँच कर सकें। लेकिन डॉक्टर ने करीम खाँ की हालत को देखकर पुलिसकर्मियों को हिदायत दी, "रोगी को अभी कुछ और आराम की सख़्त ज़रूरत है, कृपया उसे तंग न करें!" डॉक्टर के निर्देशों का पालन करते हुए, पुलिस इंस्पेक्टर और उसका सहयोगी एक तरफ़ हट गए थे।
तभी करीम खाँ ने एक सुई की चुभन को अपने कूल्हे में महसूस किया। नर्स ने उसे एक और दर्द का टीका लगा दिया था। पीड़ा से एक बार फिर वह कराह उठा था, "सिस्टर में कहाँ हूँ...मुझे क्या हुआ...?" बस इतना ही कह पाया था वह!
"आप अभी आराम कीजिये ...आप अस्पताल मे हैं...सो जाईये...घबराईये मत, आपको कुछ नहीं हुआ।" नर्स ने एक नज़र 'मॉनिटर' पर और दूसरी करीम खाँ पर रखते हुए उसे दिलासा दिया था। करीम खाँ फिर से बेहोश होने लगा था, उसे धीरे-धीरे चैन पड़ने लगा था। टीके का उस पर असर होने लगा था, शायद!
अगली सुबह जब उसकी बेहोशी पुनः टूटी तो उसे सारी घटना स्मरण हो आयी और वह अपने आप को कोसने लगा, "साला! करीम खाँ, और कर लालच। खरबूजे और तरबूज बेच कर तू जो पचास-सौ रुपये कमाता था उससे तुझे चैन की नींद तो आ जाती थी... तू अपने परिवार का पेट तो पालता था ...अपनी बीमार, बुड्ढी माँ की दवादारू तो कर लेता था। तुमने जानते हुए भी कि "कोयले की दलाली में मुँह ही काला होता है" क्यूँ अपने आप को नहीं रोका?
"अब तेरी तीन प्यारी-प्यारी जवान कुँआरी बहनों का दायित्व पूरा करने का सपना टूट नहीं जाएगा क्या?" एक के बाद एक सवाल उसे रुक-रुककर झँझोड़ रहा था। उसे जेल की सींखें नज़र आ रही थीं। उसे स्मरण हो आया था कि परसों शाम वह भारत-पाक सीमा पर था। अभी वह पूरी तरह से भारत की सीमा में सुरक्षित घुस नहीं पाया था कि सीमा-सुरक्षा बल के एक नौजवान ने उसे देख लिया था। उसने उसे चेतावनी देते हुए रुकने के लिए कहा था लेकिन वह अपनी जान बचाने के लिए सामने की झाड़ियों की ओर भागा था। लेकिन, बचकर भागने में नाकामयाब रहा था और वह अभी चार-छह फुट की दूरी पर ही था जब वह सैनिक कि बंदूक से छूटी पहली गोली का शिकार होकर, लड़खड़ा कर ज़मीन पर लुढ़क गया था। गोली उसकी दायीं टाँग में, घुटनों के नीचे लगी थी। इससे पहले कि वह अपने आप को सँभाल पाता, वह सैनिक की दूसरी गोली का शिकार हो गया था जो उसके बाएँ कन्धे में लगी थी। उसके बाद क्या हुआ या वह कहाँ था, करीम खाँ को इसकी कुछ ख़बर न थी।
तभी करीम खाँ का ध्यान अपनी ओर बढ़ते हुए उस पुलिस इंस्पेक्टर की और गया जो उत्सुकता से उसके 'बेड' के बहुत क़रीब आ गया था। उसकी नज़र अपनी दायीं बगल में बैठे दूसरे पुलिस कर्मी के काग़ज़ और 'पेन' पर भी गयी जो उसके बयान दर्ज करने के लिए तैयार थी।
"क्या नाम है तुम्हारा?" इंस्पेक्टर का पहला सवाल उसके कानों में गूँजा था।
"ऊँह... क री...म खाँ, साहिब!" जवाब देते वह कराह उठा था।
"कहाँ के रहने वाले हो?"
"बागवानपुरा, पाकिस्तान से, जनाब।"
"तुम्हें भारत-सीमा में गिरफ़्तार किया गया है, तुम जानते हो? क्या करने के इरादे से तुम भारत आ रहे थे?"
"....." जबाव में, करीम खाँ चुप रहा और उसने अपनी नम आँखें बंद कर लीं।
"मैं अभी गया नहीं हूँ,..." इंस्पेक्टर ने करीम खाँ को झँझोड़ते हुए कहा और अपना सवाल फिर दोहराया, "भारत में क्या करने आ रहे थे, किस लश्कर गिरोह से तुम्हारा ताल्लुक़ है?"
"तस्करी!" सच-सच करीम खाँ बताए जा रहा था।
"काहे की तस्करी?"
"सोने की," कहते हुए करीम खाँ एक बार फिर पीड़ा से कराह उठा। उसका गला सूख-सा रहा था।
"पानी...पानी! हाय...मर गया!" पीड़ा से पीड़ित करीम ने पानी की भीख माँगी। नर्स एक गिलास पानी ले आयी थी। बड़ी मुश्किल से अपने सिर को ऊपर करने के बाद उसने अपने काँपते हुए दुर्बल हाथों से पानी का एक घूँट भरा। उसका सिर सिरहाने से जा लगा और पानी का गिलास छलक पड़ा। कुछ क्षणों के बाद करीम खां ने थोड़ा पानी और माँगा लेकिन उसे दिया नहीं गया।
"डॉक्टर ने मना किया है," नर्स ने उसे समझाया।
जवाब पाकर, वह अपने होंठ और आँखें भींचता रह गया। इसके बाद इंस्पेक्टर ने अपने बाक़ी के प्रश्न पूछे और दोबारा वापिस आने को कह कर चला गया।
"शुक्र है, अल्लाह, तेरा!" कहते हुए स्वयं ही उसके बोल फूट पड़े। कहते-कहते उसका गला अवरुद्ध हो गया। रो पड़ा वह, अपनी मजबूरी पर! अपने मन का बोझ हल्का करते हुए नर्स से कहने लगा, "ग़रीबी कलंक है, सिस्टर! हम, भाई-बहन अभी बहुत छोटे थे, जब हमारा अब्बू फ़ौत हो गया था। सिगरेट बहुत पीता था, वह। उसे फेफड़ों का कैंसर हो गया था ....खाँसता था तो खून आता था उसकी बलग़म में! मेरे पास फूटी कौड़ी भी न होने के कारण मेरी बीवी मुझे छोड़ कर चली गयी थी...मेरी छोटी बेटी सुलमा पिछले साल हैज़े से चल बसी, जनवरी की पहली को। उम्र ही क्या थी भला तब मेरी बच्ची की? पाँच दिनों बाद उसका आठवाँ जन्म दिन था..। अस्पताल में न तो दवाइयाँ ही थीं और ना ही मेरी जेब में रोकड़ा था बाज़ार से उसके इलाज की दवा लाने को...," कहते-कहते बिलख रहा था, करीम खाँ।
अपने बिस्तर की चादर से उसने अपने आँसू पोंछ कर, रुँधे हुए गले से एक बार फिर कहना शुरू किया, "बचपन से ही हमें ख़ुशी नसीब नहीं हुई। मैं अभी 15 साल का ही था जब बड़ा भाई हसनदीन शादी के बाद घर से अलग हो गया था। बड़ा होने के नाते अपनी तीन बहनों के हाथ पीले करने के अपने दायित्व को भूल बैठा था, सारे परिवार का बोझ मुझ अकेले पर आ पड़ा था।
एक लम्बा साँस लेकर करीम खाँ ने फिर कहना शुरू किया, "मैं मंडी में सब्जी बेचने लगा था। मेरी मासूम बहनें लोगों के घरों में बर्तन माँजने और साफ़-स्फ़ाई का काम करने लगी थीं... जैसे-तैसे घर का निर्वाह होने लगा था।
शायद मेरे नसीब में दुख ही दुख और ग़म ही ग़म लिखे थे। एक दिन मैं भी बीमार पड़ गया।"
एक-एक करके बीते दिनों की सारी घटनाएँ करीम खां के स्मृतिपटल पर उभर कर आ रही थीं।
उसने फिर कहना आरंभ किया, "उस रोज़ मैं अभी मंडी पहुँचा ही था कि बहुत ज़ोर से मुझे खाँसी आने लगी थी। काफ़ी देर तक मेरी खाँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। एकाएक भयावह दर्द मेरे कलेजे में उठने लगा था। ....और जब मैं होश में आया था तो मैंने अपने आप को अस्पताल में पाया। अड़ोस-पड़ोस के दुकानदार मुझे अस्पताल में भर्ती करवा आए थे। चार महीने मैं मृत्यु-शैय्या पर पड़ा रहा...लेकिन अपने सिर पाप लिए बग़ैर मुझे मौत भी नहीं आनी थी...मैंने अपनी बहिन का ख़ून कर ....," करीम खाँ कहते-कहते अपना सिर ज़ोर-ज़ोर से बेड पर पटकने लगा। वह फूट-फूटकर रोने लगा!
उसकी आँखें ग़ुस्से से लाल सुर्ख़ हो गयी थीं। उसके घायल शरीर के इलावा जैसे उसका ज़ख़्मी दिल भी कुरेदा जा रहा था। वह कहने लगा, "अल्लाह किसी को मजबूर न करे, किसी को ग़रीब न बनाये...यह अमीर लोग बहुत हरामज़ादे होते हैं, इंस्पेक्टर साहिब...किसी की मजबूरी पर इनके पत्थर दिल नहीं पसीजते। मेरे इलाज की दवाइयों के लिए घर में पैसे नहीं थे। कहाँ से पैसे आते, साहिब? मेरी बड़ी बहन समीना मेरी जान बचाने के लिए एक सेठ से कुछ पैसे उधार लेने गयी, उसने सेठ के क पाँव भी पकड़े ... पर उस नीच भेड़िये ने ज़रा सा भी मेरी बहिन पर तरस नहीं खाया...उसने उसे कुछ पैसे तो दिये पर उसकी इज्ज़त लूटकर...! कुछ दिन बाद मैं ठीक हो गया। अस्पताल से मुझे छुट्टी मिल गयी। एक दिन...मुझे जब पता चला की समीना अपने पेट में किसी का पाप पाल रही है तो मैं ग़ुस्से में अंधा हो गया। मैं उसे एक डंडे से पीटने लगा। मैंने उससे उस शैतान का नाम बताने को कहा जिसने उसकी आबरू लूटी थी पर उसने मुँह नहीं खोला। मैं प्रहार पर प्रहार करता रहा और वह मेरी मार सहती रही, लेकिन उसने उफ़्फ़ तक नहीं की और अचानक मेरे एक प्रहार से वह सदा के लिए ख़ामोश हो गई, इंस्पेक्टर साहिब! पुलिस मुझे पकड़ कर थाने ले गयी। मुझे दस बरस का कारावास मिला...मुझे अगर फाँसी की सज़ा भी मिलती तो कम थी," कहते-कहते करीम खाँ सुबक पड़ा।
करीम खां ने अपनी दुखभरी कहानी ज़ारी रखते हुये कहा, "जेल काट कर लौटा तो फिर से मैं मंडी में सब्जी बेचने लगा। वक़्त कटने लगा था। घर में अभी भी दो जवान बहनें बैठी थीं। उनकी शादी की समस्या मुझे अन्दर ही अन्दर खाये जा रही थी। पैसे कहाँ से आयेंगे? इसी सोच में मैं डूबा बैठा था मैं, उस रोज़ जब तस्कर हनीफ़ मुझे परेशान देख कर कहने लगा, "यदि तुम हमारे साथ काम करो तो 500 रुपये फेरा मिला करेगा।"
"मरता क्या न करता, इंस्पेक्टर साहिब। मैं उसके चंगुल में फँस गया...उसकी बात को सुनकर मैंने हामी भर दी। मैं कुछ भी करने के लिए तैयार था। सोचा था बहिनों के निकाह आदि के दायित्व से निपट कर ईमानदारी की रोटी खाऊँगा, अल्लाह क़सम! मजबूरी में मजबूर क्या-क्या नहीं करता है, इंस्पेक्टर साहिब?"
"दो दिन पहले, पहली ही बार मैं भारतीय सीमा में दाख़िल हुआ था कि पहले ही दिन मैं पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया। उसके बाद मुझे कुछ मालूम नहीं कि मैं कहाँ था...?" बिना कोई उत्तर पाये करीम खाँ इंस्पेक्टर को अपने सहयोगी के साथ वापिस लौटता देख रहा था।
अस्पताल में भर्ती हुये आज करीम खां का आठवाँ दिन था। धीरे-धीरे उसके ज़ख़्म भरने लगे थे। अगले दो दिनों के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गयी थी। उसे तस्करी के जुर्म में दो मास की क़ैद हुयी थी। दिन बीतते जा रहे थे। जब उसकी सज़ा पूरी हुई तो करीम खाँ की वतन-वापसी का इंतज़ाम कर दिया गया था।
भारत सीमा से बाहर निकल कर, थके हारे इन्सान की तरह करीम खाँ मुँह लटकाए अपने घर लौट रहा था। सूर्य ढल रहा था । उसके दिल में बार-बार यही ख़याल आ रहा था कि उसके जीवन का यह अध्याय इस ढलती शाम की तरह ढल गया था। उसने अपने कान पकड़ लिए और बिलखते-बिलखते अल्लाह से अपने मार्ग-दर्शन की प्रार्थना की और उसे सही राह पर रखने की!
...और इस संकल्प के साथ करीम खाँ लौट रहा था...अपने घर की ओर...सच्चाई, ईमानदारी और मेहनत करके बाक़ी का अपना जीवन बसर करने के लिये!
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