ईर्ष्या
अशोक परुथी 'मतवाला'उसने
अपने पर्स से
निकाल दी है,
मेरी तस्वीर
और
रसोई-घर में
लगा दिये हैं
ताले!
जिस दिन से,
मैंने उसे कहा है -
"मत किया करो,
इतना शृंगार,
कि देखकर तुम्हारी
खूबसूरती,
'किचन' में
जलने लगें रोटियाँ!"
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कहानी
- ललित निबन्ध
- स्मृति लेख
- लघुकथा
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
-
- अली बाबा और चालीस चोर
- आज मैं शर्मिंदा हूँ?
- काश, मैं भी एक आम आदमी होता
- जायें तो जायें कहाँ?
- टिप्पणी पर टिप्पणी!
- डंडे का करिश्मा
- तुम्हारी याद में रो-रोकर पायजामा धो दिया
- दुहाई है दुहाई
- बादाम खाने से अक्ल नहीं आती
- भक्त की फ़रियाद
- भगवान की सबसे बड़ी गल्ती!
- रब्ब ने मिलाइयाँ जोड़ियाँ...!
- राम नाम सत्य है।
- रेडियो वाली से मेरी इक गुफ़्तगू
- ज़हर किसे चढ़े?
- हास्य-व्यंग्य कविता
- पुस्तक समीक्षा
- सांस्कृतिक कथा
- विडियो
-
- ऑडियो
-