मातृत्व मौन था
शक्ति सिंह
दूर-दूर तक सन्नाटा,
मई की तपती दुपहरी में,
पीठ पर नवजात को बाँधे,
अर्धनग्न अवस्था में,
पत्थर की गिट्टियाँ बिछाती,
मातृत्व मौन था।
धूप से झुलसा चेहरा,
श्रम-बिंदुओं से भीगा तन,
तृप्ति की एक उदार छाया में,
रूखे-सूखे अन्न से भी
दूध रचने में व्यस्त थी
मातृत्व मौन था।
अचानक शिशु के रुदन पर,
सिगनल के खंभे में छाँव ढूँढ़ने भागी,
घने, काले केशों की ओट में,
धूप में झुलसे वक्ष से
मधुर अमृत बहाने लगी और
अपने लाल को पिलाने लगी।
मातृत्व मौन था।
एक ओर जहाँ तपन को
वातानुकूलन हर लेता था,
वहीं दूसरी ओर
मातृत्व ही छाया बन जाता था।
जहाँ नवजात चारदीवारी में
सुरक्षित हो, संसार निहारता है,
वहीं यह शिशु माँ की छाती से चिपक
दुपहरी की लू सहता है।
इतने कष्ट, इतनी तपन में भी,
न कोई शिकायत, न कोई स्वर,
बस कर्त्तव्य में लीन,
मातृत्व फिर भी मौन था।