बहुत याद आता है . . .
शक्ति सिंह
बहुत याद आता है . . .
पाँच-दस पैसे से मिट्टी का गुल्लक भरना,
दादी संग चरए के मेले में जाना।
रेवड़ी, गट्टा, बताशा, चिवड़ा का स्वाद,
लकड़ी की पट्टी, नरकट, खड़िया और दवात।
बहुत याद आता है।
बैटरी से नीम तले रामायण-महाभारत देखना,
होली, दीपावली, ईद पर महीनों तक झूमना।
जाँत की रोटी, चकरी की दाल,
बथुआ का साग, करहनी का भात।
बहुत याद आता है।
पोखर की डुबकी, भैंस नहलाना,
बरसिंग और भूसा का सानी बनाना।
थान पर लुटिया में दूध पी लेना,
बोरसी की मेट से लाल साड़ी खाना।
बहुत याद आता है।
ताजिए में हिंदू-मुस्लिम का एक-सा जोश,
रक्षाबंधन में भाई-बहन का निष्कलुष स्नेह।
पाठशाला से पहले माँ के चरण छूना,
लौटते समय पिता के कंधे से बैर तोड़ना।
बहुत याद आता है।
गेहूँ की दवाई, धान की कुटाई,
आलू की खुदाई, गन्ने की कटाई।
लहसुन-प्याज़ की गुड़ाई व निराई,
सनई की धुनाई, सरसों की ओसाई।
बहुत याद आता है।
पगडंडी से गुज़रती लालटेन की पढ़ाई,
गाँधी का झोला, खालिसपुर का हलवाई।
मिट्टी का घर, दोस्तों की लड़ाई,
जिन्ह का डर, कृष्णमुरारी की दवाई।
बहुत याद आता है।
दादी की कहानी, दादा की सवारी,
बुआ का चिढ़ाना, फूफा की ज़िम्मेदारी।
मौसी का कपड़ा, मामा का खिलौना,
चाचा का घुमाना, चाची का नहलाना।
बहुत याद आता है।
मामी के हाथों की आलू-टमाटर की सब्ज़ी,
नाना की कचौड़ी, नानी की मिठास भरी थाली।
भैया की डाँट, भाभी का मज़ाक,
घर का वह हँसता-खिलखिलाता हर एक क्षण।
बहुत याद आता है।
महुआ का मालपुआ, ऊँख का रस,
सुबह का कलेवा, शाम का दाना।
ठंड की तपाई, गर्मी की चारपाई,
चने का ओरहा, छठी का सोहर।
बहुत याद आता है।
बड़ा सा चबूतरा, माँ का प्यार,
छोटा सा गाँव, अद्भुत वह संसार।
मिट्टी की ख़ुश्बू, रिश्तों की धार,
सादगी में बसता था, जीवन का सार।
बहुत याद आता है।
आज शहर की भीड़–भाड़ में,
माया-मोह के उलझे जाल में,
झूठे सुख और सम्पत्ति की अंधी चाह में,
वह सब कहीं पीछे छूट गया।
जो आज भी . . .
बहुत याद आता है।