जन्मदिन की आत्मव्यथा

01-06-2026

जन्मदिन की आत्मव्यथा

मुनीष भाटिया (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

आज जीवन का एक और वर्ष
शांत स्वर में मुझसे कह गया—
मानव जन्म साधारण नहीं होता, 
यह ईश्वर का अनुपम वरदान है। 
 
अपार संभावनाओं के नभ में
हर पल उड़ान भरता है मन, 
सपनों के पंख लगाकर
छू लेना चाहता है अनंत गगन। 
 
किन्तु जन्म लेते ही मानव
उलझ जाता है संसार के जाल में, 
कभी झूठ, कभी फ़रेब, 
कभी अपनों से ही बने सवाल में। 
 
जीवन की अंतिम मंज़िल मृत्यु है, 
यह सत्य सभी जानते हैं, 
फिर भी न जाने क्यों
मोह-माया में भटकते रहते हैं। 
 
हर जन्मदिन पर मन पूछता है—
क्या पाया और क्या खोया? 
कितनों को अपना बना पाया, 
और कितनों से नाता खोया? 
 
धरा पर भटकता रहा इंसान
अनजान राहों की तलाश में, 
जो मिला उसे कम ही लगा
नई इच्छाओं की प्यास में। 
 
जानता है मानव कि
ख़ाली हाथ ही जाना है, 
फिर भी जीवन भर
संसार सजाना है। 
 
आज इस दिवस पर
बस इतना सा एहसास हुआ—
ऊँची उड़ानों से बड़ा सुख
अपनों के बीच लौट आना हुआ। 
 
यदि प्रेम, अपनापन और सुकून मिला, 
तो यही जीवन की सच्ची जीत है, 
वरना सब कुछ पाकर भी
मन भीतर से अधूरा ही रहता है। 

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