नया पुराना
मुनीष भाटिया
बीते कल से जो सीख ले,
वही आगे बढ़ पाता है,
बीते कल को समझना ही,
आने वाले कल की शुरूआत है।
नए को सर्वश्रेष्ठ मान लिया,
पुराने को बोझ समझा,
जिसने थामे थे तूफ़ाँ,
वही आज बेक़द्र क्यों है?
युवा को लगता है
वह वृद्ध से ज़्यादा समझदार है,
और बालक को भरोसा है,
वह युवा से कम नहीं है।
नए पत्तों का अंकुरन,
ये क़ुदरत का दस्तूर सही,
पर जिन पत्तों ने छाया दी,
उनका हटना क्यों लाज़िम है?
हर बार प्रण लेते हैं हम,
भूलों को न दोहराएँगे,
फिर वही राहें, वही ठोकर
इंसान का ये मिज़ाज कैसा है?
जो टूट-टूटकर बना गए,
मज़बूत वृक्षों की नींव,
उन बलिदानों का हिसाब
आज भी बक़ाया सा है।
नया ज़रूरी है,
इसमें कोई इनकार नहीं,
पर पुरानों से सीखकर ही
भविष्य मज़बूत बनता है।