आजकल 

मुनीष भाटिया (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

फ़ुर्सत कहाँ किसी को किसी के लिए यहाँ, 
मस्त हैं सब अपने-अपनों में ही आजकल। 
 
दौर आया कुछ ऐसा इस कलयुग का देखो, 
हर कोई है बेख़बर, बेक़दर सा आजकल। 
 
रिश्ते भी अब बनते हैं सोच-समझ कर यूँ, 
कब, कहाँ, किससे क्या काम पड़ जाए आजकल। 
 
चेहरों पर मुस्कान है, दिलों में हिसाब छुपा, 
हर बात में मतलब का असर है आजकल। 
 
चंद लम्हों की चाहत, और सालों की दूरी, 
रिश्तों का भी अजीब सफ़र है आजकल। 

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