दस्तूर

मुनीष भाटिया (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

रोज़ का दर्द अब लोगों को
कहानी लगता है, 
कैसा ये दस्तूर ज़िंदगी का
दर्द बेहिसाब लगता है। 
 
आँखों की नमी भी अब
एक कमज़ोरी लगती है, 
टूटती आवाज़ का रुदन
पुराना-सा लगता है। 
 
चुप्पी की वजह कोई
पूछता नहीं अब ज़माना, 
सबको पहले से ही
सब आदत-सा लगता है। 
 
दर्द रोज़ सहने से जब
एहसास मर जाता है, 
फिर हँसता चेहरा ही
सबसे आसान लगता है। 
 
सब्र की दीवार जब
अचानक ढह जाती है, 
तो लोगों को सब कुछ
मामूली बात लगता है। 
 
समझाए कौन किसे कि
यही अनकही बात, 
हर रोज़ ज़िंदा रहकर
मरने का हिसाब लगता है। 

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