बेबस

मुनीष भाटिया (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

दोराहे पर खड़ा ये जीवन, 
थका हुआ, टूटा सा मन, 
मौत के इंतज़ार में जैसे
हर घड़ी लगे बोझिल मन। 
 
ना दवा कोई काम करे अब, 
ना दुआ में वो असर रहा, 
साँसें जैसे उधार की हों, 
हर धड़कन पर डर सा रहा। 
 
क्यों जीना चाहता है मन ये, 
जब सीमा लिख दी क़िस्मत ने, 
क्यों सपनों की चादर ओढ़े
जलता रहता है उलझन में। 
 
आशिक़ बनकर आवारा सा
मन व्यर्थ ही भटक रहा, 
जिसे पाया ही नहीं कभी, 
उसी में ख़ुद को ढूँढ़ रहा। 
 
कैसे छोड़ दे मोह का धागा, 
हर पल यही तो तोड़ रहा, 
ज़िंदगी अभी भी बाक़ी है, 
बेबसी में ख़ुद से रूठ रहा। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें