भाषा की भूमिका ‘विकसित भारत’ के लिए
प्रो. ऋषभदेव शर्माभारत वर्ष 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी पूर्ण करेगा। इस ऐतिहासिक मोड़ तक देश को ‘विकसित राष्ट्र’ के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य राष्ट्रीय नीति-चिंतन का केंद्रबिंदु बन चुका है। विकास को मात्र आर्थिक संकेतकों—उच्च प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक उत्पादन अथवा प्रौद्योगिकीय अवसंरचना—तक सीमित रखना अपर्याप्त है। बल्कि, विकास एक बहुआयामी प्रक्रिया है जिसमें ज्ञान का सृजन, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामाजिक समावेशन तथा शासन की दक्षता अंतर्निहित हैं। कहना न होगा कि इस समग्र प्रक्रिया में भाषा निर्णायक भूमिका निभाती है। भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, अपितु ज्ञान-व्यवस्था, पहचान-निर्माण, शासन-प्रक्रिया और नवाचार का आधार है। अतः विकसित भारत@2047 के संदर्भ में भाषा की संभावित बहुआयामी भूमिका की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
विकसित राष्ट्र की अवधारणा को केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह एक समग्र एवं बहुआयामी संरचना है, जिसमें निम्नलिखित आयाम सम्मिलित हैं:
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आर्थिक आयाम: उच्च सकल घरेलू उत्पाद, नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था, रोज़गार सृजन तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता।
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सामाजिक आयाम: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच, सामाजिक न्याय तथा समावेशी विकास।
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प्रौद्योगिक एवं वैज्ञानिक आयाम: अनुसंधान एवं विकास, डिजिटल अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण।
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सांस्कृतिक एवं पहचानपरक आयाम: भाषा-संस्कृति की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक ज्ञान-संवाद में सक्रिय भागीदारी।
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शासनपरक आयाम: पारदर्शी, उत्तरदायी एवं नागरिक-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था।
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पर्यावरणीय आयाम: सतत विकास एवं जलवायु संबंधी उत्तरदायित्व।
इन सभी आयामों को एक सूत्र में पिरोने वाली कड़ी भाषा है। विकसित राष्ट्र वह है जहाँ नागरिक अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित कर सकें, शासन तंत्र से सहज संवाद स्थापित कर सकें तथा वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ प्रतिष्ठित हो सकें।
भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश, डिजिटल परिवर्तन, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र तथा बुनियादी ढाँचे में निवेश से विकास की दृष्टि से अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती दिख रही हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, डिजिटल इंडिया तथा मेक इन इंडिया जैसे अभियान दीर्घकालिक दृष्टि को प्रतिबिंबित करते हैं। तथापि, केवल आर्थिक समृद्धि विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता में क्षेत्रीय असमानता, कौशल अंतराल, बेरोज़गारी तथा भाषाई असमानता संरचनात्मक बाधाएँ बनी हुई हैं।
उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान क्षेत्र में अंग्रेज़ी की प्रभुता के कारण समाज का एक विशाल वर्ग ज्ञान एवं अवसरों की मुख्यधारा से अपेक्षित रूप से जुड़ नहीं पाता। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण ज्ञान-सामग्री का अभाव इस असमानता को और गहरा करता है। जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या दबाव तथा भू-राजनीतिक अनिश्चितताएँ अतिरिक्त चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं। अतएव, 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तभी साकार हो सकता है, जब आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक न्याय, अवसरों की समानता तथा भाषाई समावेशन सुनिश्चित किया जाए।
ऐतिहासिक अनुभव इंगित करता है कि जिन राष्ट्रों ने अपनी भाषाओं को ज्ञान, विज्ञान एवं शासन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया, वे तीव्र एवं स्थायी विकास की ओर अग्रसर हुए। भाषा विकास प्रक्रिया में निम्नलिखित भूमिकाएँ निभाती है:
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मातृभाषा में ज्ञान का सृजन एवं प्रसार सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध होता है।
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वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी का स्थानीयकरण भाषा के माध्यम से ही संभव है।
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आर्थिक गतिविधियों में भाषाई सहजता उत्पादकता एवं दक्षता में वृद्धि करती है।
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शासन में भाषाई सुगमता पारदर्शिता, जवाबदेही एवं नागरिक भागीदारी को सुदृढ़ करती है।
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सांस्कृतिक आत्मविश्वास आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति में रूपांतरित होता है।
अतः भाषा विकास का मात्र सहायक उपकरण नहीं, अपितु उसकी संरचनात्मक आधारशिला है।
यह तो मानी हुई बात है कि भारत की भाषाई विविधता उसकी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग है। यह भी सच है कि बहुभाषिक व्यवस्था प्रशासनिक समन्वय, न्यायिक प्रक्रियाओं तथा शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक जटिलताएँ उत्पन्न करती है। तथापि, इस विविधता को मात्र बाधा मानना असंगत होगा। विभिन्न भाषाएँ भिन्न सामाजिक अनुभवों, ज्ञान-प्रणालियों एवं सांस्कृतिक दृष्टियों को अभिव्यक्त करती हैं, जो नवाचार एवं रचनात्मकता का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। बहुभाषी मानव संसाधन वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ा सकता है। क्षेत्रीय भाषाएँ स्थानीय अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक उद्योगों तथा सामाजिक पूँजी को सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं।
समसामयिक भाषा-प्रौद्योगिकी (मशीन अनुवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण तथा डिजिटल भाषा संसाधन) बहुभाषिकता से जुड़ी पारंपरिक कठिनाइयों को पर्याप्त रूप से कम करने में सक्षम हैं। समस्या भाषाई विविधता में नहीं, अपितु उसके प्रबंधन की नीति में निहित है। यदि भाषाओं को परस्पर पूरक माना जाए तथा शिक्षा, प्रशासन एवं प्रौद्योगिकी में प्रमुख भारतीय भाषाओं को पर्याप्त स्थान दिया जाए, तो बहुभाषिकता विकास का उत्प्रेरक सिद्ध हो सकती है।
भारत की भाषा नीति संविधान के प्रावधानों पर आधारित है। अनुच्छेद 343 हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित करता है, अनुच्छेद 351 हिंदी के विकास का निर्देश देता है, आठवीं अनुसूची राष्ट्र की 22 भाषाओं को मान्यता प्रदान करती है तथा त्रिभाषा सूत्र क्षेत्रीय भाषा, हिंदी एवं अंग्रेज़ी के संतुलन का प्रयास करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा में शिक्षा पर बल देती है। तथापि, व्यावहारिक स्तर पर अंग्रेज़ी की निरंतर प्रभुता तथा हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के बीच संतुलन की चुनौती बनी हुई है। विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भाषा नीति को अधिक समावेशी, व्यावहारिक एवं प्रौद्योगिकी-समर्थित बनाने की आवश्यकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाषा ज्ञान, अधिकार एवं अवसरों तक पहुँच का माध्यम है। जनता की भाषा (मातृभाषा अथवा क्षेत्रीय भाषा) सहजता, आत्मीयता एवं व्यापक पहुँच से युक्त होती है। इसके विपरीत, अंग्रेज़ी दीर्घकाल से उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, विधि एवं रोज़गार के क्षेत्रों में शक्ति की भाषा के रूप में स्थापित रही है। अंग्रेज़ी ज्ञान की उपयोगिता निर्विवाद है, परंतु जब वह ज्ञान एवं अवसर की अनिवार्य पूर्व शर्त बन जाती है, तब भाषा सामाजिक-आर्थिक असमानता के वितरण का साधन बन जाती है।
ज्ञान के भाषाई अंतराल के कारण ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों की प्रतिभा विकास की मुख्यधारा से वंचित रह जाती है। विकसित भारत की संकल्पना को साकार करने हेतु इस अंतराल को समाप्त करना अपरिहार्य है। इसके लिए भारतीय भाषाओं में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, विधि एवं प्रशासन की गुणवत्तापूर्ण सामग्री का व्यापक सृजन आवश्यक है। अंग्रेज़ी का बहिष्कार नहीं, अपितु भारतीय भाषाओं के साथ उसका रचनात्मक समन्वय व्यावहारिक मार्ग है।
भाषाई अवरोधों के निराकरण हेतु निम्नलिखित रणनीतिक हस्तक्षेप अपेक्षित हैं:
प्रथम, भारतीय भाषाओं में मात्र अनुवाद नहीं, अपितु मौलिक एवं उच्च गुणवत्तायुक्त ज्ञान-सामग्री का सृजन।
द्वितीय, भाषा-प्रौद्योगिकी अवसंरचना (डिजिटल कॉर्पस, शब्दकोश, अनुवाद तंत्र एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों) का सुदृढ़ीकरण।
तृतीय, शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा को प्राथमिक माध्यम बनाते हुए अंग्रेज़ी को अतिरिक्त कौशल के रूप में समाहित करना।
चतुर्थ, प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रक्रियाओं को जनता की भाषाओं में सुलभ बनाना।
पंचम, अंग्रेज़ी को ही आधुनिकता एवं प्रतिष्ठा की भाषा मानने वाली मानसिकता का रूपांतरण, जो भारतीय भाषाओं में उच्च स्तरीय ज्ञान एवं अवसर उपलब्ध कराकर ही संभव है।
ये हस्तक्षेप मात्र भाषाई नीति के प्रश्न नहीं, अपितु ज्ञान के लोकतंत्रीकरण एवं अवसरों की समानता के प्रश्न हैं।
यहाँ यह कहना प्रासंगिक होगा कि ‘विकसित भारत’ के संदर्भ में राजभाषा अधिकारियों की भूमिका अनुवाद एवं नियम-पालन तक सीमित नहीं रह सकती। उनकी नवीन ज़ि्मेदारियों में भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सामग्री का सृजन एवं प्रसार, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर राजभाषा की सुलभता, वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली का मानकीकरण, भाषा-प्रौद्योगिकी विकास में सक्रिय भागीदारी तथा हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के बीच सेतु-निर्माण सम्मिलित हैं। राजभाषा तंत्र को विकास का उत्प्रेरक एवं भाषाई समावेशन का प्रहरी बनना होगा।
निष्कर्षतः, ‘विकसित भारत@2047’ की संकल्पना तभी साकार हो सकती है, जब भाषा को विकास का केंद्रीय स्तंभ स्वीकार किया जाए। बहुभाषिकता को संसाधन के रूप में विकसित करना, जनता की भाषा को शक्ति की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना तथा प्रौद्योगिकी के माध्यम से भाषाई अंतराल को समाप्त करना इस लक्ष्य की पूर्ति की अनिवार्य शर्त हैं। भाषा मात्र संप्रेषण का माध्यम नहीं, अपितु विकास की संरचनात्मक रीढ़ है।
हिंदी परामर्शी, दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र,
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद
ईमेल: rishabhadeosharma@yahoo.com
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