विवाह के समय दुलहन के हाथों में शोभता ‘चूड़ा’

15-05-2026

विवाह के समय दुलहन के हाथों में शोभता ‘चूड़ा’

स्नेहा सिंह (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मेहँदी से रँगे नववधू के हाथों में चूड़ा पहनाने से सौंदर्य खिल उठता है।

नाज़ुकता, सौंदर्य, पवित्रता, सौभाग्य और लज्जा का प्रतीक मानी जाने वाली चूड़ी स्त्रीत्व का प्रतिनिधित्व करती है। इसी कारण बिना चूड़ियों वाले हाथों वाली स्त्री को देखकर उसके जीवन का ख़ालीपन मन को दुखी कर देता है। पारंपरिक और सांस्कृतिक जगत ही नहीं, बल्कि फ़ैशन जगत में भी चूड़ियों का महत्त्व आज तक बना हुआ है। यही वजह है कि आधुनिक नववधू विवाह के समय इमिटेशन ज्वेलरी का 10-15 हज़ार रुपए तक का चूड़ा पहनती है।

आज भले ही दुलहन के फ़ैशनेबल चूड़े की क़ीमत हज़ारों रुपए हो, लेकिन चूड़ा पहनने की यह परंपरा नई नहीं है। भारत के लगभग सभी प्रांतों में विवाह के समय दुलहन के हाथों में चूड़ा पहनाया जाता है। मेहँदी लगे हाथों में जब चूड़ा सजता है तो सौंदर्य निखर उठता है।

महाराष्ट्र में विवाह के समय हरे रंग की चूड़ियों का चूड़ा भरा जाता है। बंगाली दुलहनें शंख और लाख की चूड़ियाँ पहनती हैं, परन्तु वह उनका विवाह चूड़ा नहीं होता। विवाह के समय उनके हाथ में लोहे का कड़ा पहनाया जाता है, जिसे ‘बहुती’ कहा जाता है।

प्राचीन काल से शंख की चूड़ियों की परंपरा चली आ रही है। पहले शंख की चूड़ियाँ अधिकतर सफ़ेद और सपाट होती थीं, लेकिन अब रंग-बिरंगी और विभिन्न प्रकार की शंख चूड़ियाँ मिलती हैं, जैसे सोनमुखी, माया, गिनीबाला आदि। सोनमुखी चूड़ी का पिछला भाग सुनहरा होता है, इसलिए उसे पीले, हरे और लाल रंगों में रँगा जाता है। माया प्रकार की चूड़ियों पर जलतरंग, बिंदिया, मोतीदाने जैसी नक़्क़ाशी होती है, जबकि गिनीबाला प्रकार की चूड़ियाँ विशेष रूप से बालिकाओं के लिए बनाई जाती हैं।

गुजराती और राजस्थानी नववधू को विवाह के समय मायके से हाथीदाँत की चूड़ियाँ पहनाई जाती थीं। इन चूड़ियों के बिना दुलहन विवाह मंडप में खड़ी नहीं हो सकती थी। पंजाबी दुलहन लाल और सफ़ेद रंग की हाथीदांत की चूड़ियाँ पहनती थी। हालाँकि अब हाथीदांत की जगह लाख और प्लास्टिक की चूड़ियों ने ले ली है। ये चूड़ियाँ चार के जोड़े में पहनी जाती हैं।

जब तक युवती को नववधू के रूप में बैठाया जाता है, तब तक उसके हाथों में चूड़ा रहता है। फिर परिवार की परंपरा के अनुसार पंद्रह दिन या एक महीने बाद ये चूड़ियाँ उतारकर गाँव के मंदिर में रख दी जाती हैं और नववधू को रसोईघर में प्रवेश की अनुमति दी जाती है।

सौभाग्य का प्रतीक माना जाने वाला चूड़ा विवाहिता के गर्भधारण के समय भी उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। गुजराती विवाहिता जब गर्भवती होती है, तब सातवें महीने की सीमंत विधि में उसकी ननद उसे चाँदी की राखड़ी पहनाती है। दक्षिण भारत में भी इसी प्रकार की रस्म होती है, जिसे ‘वलैकाप्पू’ कहा जाता है। इस रस्म में गर्भवती स्त्री के एक हाथ में 21 और दूसरे हाथ में 22 रंग-बिरंगी चूड़ियाँ पहनाकर उसे मायके भेजा जाता है।

वैदिक काल में कंगन, कंकण, चूड़ा, पाटली, बिलवर, धातु के कड़े, गोट तथा आवापक, परिहार्य और वलय जैसे चूड़ियों के अनेक प्रकार प्रचलित थे। वलय अर्थात्‌ सोने के कड़े। वलय में फलकवलय नामक एक प्रकार की चपटी रत्नजड़ित चूड़ी भी आती थी।

अमरावती स्तूप की एक मूर्ति में फलकवलय दिखाई देता है। कालिदास के काव्यों में कनकवलय का उल्लेख मिलता है, अर्थात्‌ सोने की चूड़ियाँ। मेघदूत में विरही यक्ष के कनकवलय पिघलकर गिर जाने से हाथ ख़ाली हो जाने का वर्णन है। उसी प्रकार दुष्यंत के वियोग में शकुंतला के कनकवलय कोहनी तक चढ़ जाने का भी उल्लेख मिलता है।

वलय के नीचे कंकण पहना जाता था। संस्कृत साहित्य में कंकण का बारबार उल्लेख मिलता है। मेदिनीकोश में कंकण शब्द के करभूषण, मंडन और सूत्र, ये तीन अर्थ दिए गए हैं। चूड़ा और चूड़ली कंकण के ही प्रकार हैं। चूड़ा अर्थात्‌ सोने के तारों से बने मोटे कंकण और चूड़ली अर्थात्‌ उसी प्रकार के पतले कंकण।

मोहनजोदड़ो के उत्खनन में मिली एक स्त्री मूर्ति के हाथ कोहनी तक कंकणों से सजे हुए पाए गए। शुंग काल में यक्षिणियों की मूर्तियों में भी कंकण दिखाई देते हैं। उसी प्रकार मिट्टी की रंगीन चूड़ियाँ भी उत्खनन में मिली हैं। सांची के स्त्री चित्रों, गांधार मूर्तिकला और अजंता की स्त्री मूर्तियों के हाथों में भी कंकण दिखाई देते हैं।

सिंधु सभ्यता से सोने, चाँदी तथा काँसे की खोखली चूड़ियाँ मिली हैं तथा आर्यकाल में सोने की चूड़ियों के उपयोग के प्रमाण मिले हैं। यजुर्वेद में विवाह अवसर पर सोने की चूड़ियाँ और आभूषण पहनने का उल्लेख है। इससे यह माना जा सकता है कि उस समय भी चूड़े प्रचलित थे।

ईसा पूर्व 100 से ईसवी 100 के काल में इंडो-ग्रीक शैली की नक़्क़ाशीदार सोने की खोखली चूड़ियाँ पहनी जाती थीं। कुषाण काल में सोने तथा काँसे की चूड़ियाँ प्रचलित थीं। गुप्त काल में भी धातु की चूड़ियाँ थीं और मध्यकाल में सोने-चाँदी की नक़्क़ाशीदार चूड़ियाँ पहनी जाती थीं। ईसवी 1200 के बाद मुस्लिम काल में महिलाओं की चूड़ियों के सिरों पर मगर और हाथी के मुख बनाए जाते थे। युरोपियों के संपर्क में आने के बाद भारत में चूड़ियों पर पाश्चात्य डिज़ाइन बनने लगे और हल्की व साधारण चूड़ियों का चलन शुरू हुआ।

चूड़ा, चोटी और चांदला विवाहिता के पारंपरिक सौभाग्य-चिह्न हैं, जिन्हें सदियों से कड़े, कंकण, चूड़ी और कनकवलय जैसे रूपों में नववधू धारण करती आई है। 

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