सुकून की तलाश

15-06-2026

सुकून की तलाश

मुनीष भाटिया (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तप्त धरा को सुकून मिलता, 
वर्षा की दो बूँदों से, 
सूखे पेड़ों को हरियाली, 
नव पल्लव के स्पर्शों से। 
दरिया को भी चैन मिलता है, 
सागर की आग़ोश में, 
पंछी लौट के आ जाते हैं, 
शाम ढले जब घोंसलों में। 
पर इंसान भटकता फिरता, 
जाने किस अरमान लिए, 
सुख के झूठे बाज़ारों में, 
सपनों की दुकान लिए। 
उम्र गुज़रती जाती है यूँ, 
सामान इकट्ठा करने में
अपने ही अपनों से दूर हुए, 
दुनिया को बेहतर करने में। 
हसरत का बोझ उठाए, 
थक जाता है तन मन
मृगतृष्णा के पीछे भागे, 
जैसे भटके कोई हिरन। 
पता नहीं क्यों भूल गया वह, 
सत्य सरल और सीधा मंत्र, 
तन के मानसरोवर में ही, 
छिपा सुकून का निर्मल तंत्र। 
जो कमाया सब रह जाएगा, 
साथ न कुछ भी जाएगा, 
वक़्त का दरिया बहते-बहते, 
हर रिश्ता भी ले जाएगा। 
औलादों की ख़ातिर, 
जो अंबार लगा रखे हैं
गर क़ाबिल हैं तो कमा लेंगी, 
वरना संचित भी गँवा देंगी। 
फिर क्यों इतना बोझ उठाए, 
क्यों बेचैन सफ़र करता, 
क्यों इच्छाओं के जंगल में, 
ख़ुद का जीना भूल गया। 
खोल ज़रा मुट्ठी की गिरफ़्त, 
रेत यूँ फिसलेगी फिर, 
मन हल्का हो जाएगा तो, 
ज़िन्दगी भी मुस्काएगी। 
मृगतृष्णा का ताज उतार दे, 
मन का बोझ भी हल्का होगा, 
जिस सुकून की तलाश में निकला, 
वह तेरे भीतर ही होगा। 

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