साहित्य के बहुरंगी हस्ताक्षर, संजीव जयसवाल ‘संजय’ से एक संवाद
डॉ. ऋतु शर्मासमकालीन हिंदी साहित्य के व्यापक आकाश में संजीव जयसवाल एक ऐसे सशक्त, बहुआयामी और निरंतर सक्रिय रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपनी सृजनशीलता के माध्यम से साहित्य की विविध विधाओं को समृद्ध किया है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी जनपद के धौरहरा जैसे साधारण परिवेश से निकलकर उन्होंने असाधारण साहित्यिक ऊँचाइयों को स्पर्श किया है।
मई 1958 में जन्में संजीव जयसवाल ने वाणिज्य विषय में स्नातकोत्तर (एम.कॉम.) की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु उनका वास्तविक रुझान सृजनात्मक लेखन की ओर रहा। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा साहित्य साधना को समर्पित किया। उनके लेखन में समाज के विविध आयाम—मानवीय संवेदनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, नैतिक प्रश्न, बाल मनोविज्ञान और समकालीन यथार्थ—गहरी संवेदनशीलता और प्रभावशाली शैली में अभिव्यक्त हुए हैं।
अब तक 73 से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन, तथा देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 1250 से अधिक कहानियों और व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन, उनकी अद्वितीय रचनात्मक ऊर्जा का प्रमाण है। कहानी, व्यंग्य, उपन्यास, बाल उपन्यास, बाल कहानियाँ और चित्रकथाओं के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा है। विशेष रूप से बाल साहित्य में उन्होंने जिस सहजता, रोचकता और शिक्षाप्रद दृष्टिकोण का परिचय दिया है, वह उन्हें समकालीन लेखकों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
उनकी चर्चित कृतियाँ—‘खोया हुआ बचपन’, ‘गुरू-दक्षिणा’, ‘मैं चुप नहीं रहूँगी’, ‘डेमोक्रेसी का चौथा खम्भा’, ‘लंका का लोकतंत्र’ तथा ‘डूबा हुआ किला’—न केवल पाठकों के बीच लोकप्रिय रही हैं, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। ‘डूबा हुआ किला’ और ‘मानव फैक्स मशीन’ जैसी कृतियों के लिए उन्हें भारत सरकार के प्रतिष्ठित भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित किया जाना उनकी साहित्यिक उपलब्धियों की पुष्टि करता है।
संजीव जयसवाल की रचनाओं की एक विशेषता उनकी व्यापकता और बहुभाषिक पहुँच है। उनकी अनेक कृतियों का देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है, जिससे उनका साहित्य वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना सका है। विशेष रूप से बाल साहित्य की चित्रकथाओं का अनेक अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद होना उनकी लोकप्रियता और उपयोगिता का सशक्त प्रमाण है।
केवल लेखन ही नहीं, बल्कि साहित्यिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। वे अनेक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में निर्णायक रहे हैं, विभिन्न साहित्यिक आयोजनों की अध्यक्षता कर चुके हैं, तथा रेडियो और दूरदर्शन पर उनकी रचनाओं का प्रसारण हुआ है। उनकी लेखनी में जहाँ एक ओर सामाजिक सरोकारों की सजगता है, वहीं दूसरी ओर बालमन की कोमलता और कल्पनाशीलता का अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है।
यह संकलन संजीव जयसवाल के साहित्यिक व्यक्तित्व की उसी बहुरंगी यात्रा का एक विनम्र परिचय है। उनकी रचनाएँ न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि पाठकों को सोचने, समझने और समाज के प्रति सजग होने की प्रेरणा भी देती हैं।
आशा है कि यह साक्षात्कार पाठकों को आपके समृद्ध साहित्यिक संसार से परिचित कराएगा और हिंदी साहित्य के इस महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर को और अधिक व्यापक पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगा।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आपके लेखन की शुरूआत कैसे हुई? क्या बचपन से ही साहित्य की ओर झुकाव था?
संजीव जयसवाल:
मुझे लगता है कि किसी भी लेखक द्वारा यह बता पाना बहुत मुश्किल होगा कि उसके लेखन की शुरूआत कैसे हुई। क्यूँकि लेखन की शुरूआत किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता। जीवन के अनेक छोटे–बड़े अनुभव, उतार-चढ़ाव, संस्कार और परिवेश का यह सम्मिलित प्रभाव होता है कि मनुष्य के जीवन की दिशा किसी एक धारा की ओर मुड़ जाए। मेरे घर में बचपन से ही एक साहित्यिक वातावरण था। पिताजी को पढ़ने का अत्यंत शौक़ था और घर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाएँ तथा उपन्यास नियमित रूप से आते रहते थे। एक बच्चे के रूप में जब आप पुस्तकों के बीच बड़े होते हैं, तो पढ़ना आदत नहीं, स्वभाव बन जाता है—और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
वैसे लेखन की दिशा में पहला ठोस क़दम मैंने अनजाने में ‘पत्र-लेखन’ के माध्यम से रखा। मैं अपने रिश्तेदारों, विशेषकर अपनी मौसेरी बहन को लंबे, भावपूर्ण और घटनाओं से भरे पत्र लिखा करता था। उन पत्रों को पढ़कर एक दिन उनकी एक सहेली ने कहा—“तुम्हारा भाई बहुत अच्छे पत्र लिखता है, उसकी शैली बहुत सशक्त है, अगर कोशिश करे तो एक अच्छा लेखक बन सकता है।” वह एक साधारण-सी बात थी, लेकिन उसने मेरे भीतर कहीं लेखन का एक बीज बो दिया था।
इसके अतिरिक्त समाज में साहित्यकारों के प्रति सम्मान देखा, तो यह महसूस हुआ कि शब्दों की दुनिया केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक पहचान भी है। धीरे-धीरे पढ़ने का शौक़ लिखने की आदत में कब बदल गया पता ही नहीं चला।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आपने कहानी, व्यंग्य, उपन्यास और बाल साहित्य—सभी विधाओं में लिखा। इनमें से कौन-सी विधा आपको सबसे अधिक प्रिय है और क्यों?
संजीव जयसवाल:
साहित्य मेरे लिए किसी एक विधा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समग्र साधना है। जैसे एक चित्रकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए अनेक रंगों का सहारा लेता है और हर रंग मिलकर ही चित्र को पूर्णता देते हैं, जैसे एक साधक विभिन्न पुष्पों से अपने आराध्य की साधना करता है वैसे ही मैं भी साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से माँ सरस्वती की साधना करता हूँ। मैं साहित्य को न तो विधाओं के खाँचों में बाँधकर देख पाता हूँ और न ही टाइप्ड होकर लेखन कर पाता हूँ। कहानी, उपन्यास, व्यंग्य या बाल-साहित्य—हर विधा की अपनी अलग प्रकृति, चुनौती और आनंद है और मुझे हर विधा की साधना करने में भरपूर आनंद आता है।
हाँ इतना ज़रूर कहूँगा कि प्रौढ़ साहित्य—विशेषकर कहानियाँ और उपन्यास—मेरे लिए आत्म-अभिव्यक्ति और आंतरिक संतुष्टि का माध्यम हैं। इनमें मैं जीवन के जटिल प्रश्नों, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय मनोविज्ञान को गहराई से अभिव्यक्त कर पाता हूँ। वहीं व्यंग्य मेरे भीतर के उस विद्रोही स्वर का प्रतिनिधित्व करता है, जो समाज की विसंगतियों को देखकर चुप नहीं रह पाता।
दूसरी ओर, बाल-साहित्य मेरे लिए लेखन नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व है। देश और समाज ने हमें बहुत कुछ दिया है इसलिए हमारा कर्त्तव्य हो जाता है कि हम भी देश और समाज को कुछ वापस लौट आए। बच्चे देश और समाज का भविष्य होते हैं, और उनके मन में जो संस्कार बचपन में बोए जाते हैं, वही आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का आधार बनते हैं इसलिए यह समाज के हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि वह बच्चों के व्यक्तित्व के निर्माण में अपना-अपना सहयोग दें। एक बाल साहित्यकार के रूप में मैं बच्चों केमनोरंजन के साथ-साथ उनमें मूल्यबोध को भी सहज रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ।
यदि आपके मूल प्रश्न ‘प्रियता’ की बात करूँ, तो किसी एक विधा को चुनना मुश्किल होगा—क्योंकि हर विधा मेरे व्यक्तित्व के एक अलग पक्ष को अभिव्यक्त करती है। मैं जिस विधा में लिखता हूँ, उस समय पूरी तरह उसी में डूब जाता हूँ। फिर भी कहना चाहूँगा कि प्रत्येक साहित्यकार को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी समझते हुए बाल साहित्य को प्राथमिकता के आधार पर लिखना चाहिए।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आपकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। क्या यह आपके व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित है?
संजीव जयसवाल:
यह स्वाभाविक है कि प्रत्येक रचनाकार का लेखन उसके जीवनानुभवों से प्रभावित होता है। मैं भी इससे अलग नहीं हूँ। जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं, महसूस करते हैं—वह कहीं न कहीं हमारे अन्तर्मन में संचित होता रहता है और अवसर मिलने पर अभिव्यक्ति का रूप ले लेता है।
मेरे लेखन में सामाजिक सरोकार इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि मैं स्वयं को इस समाज का एक संवेदनशील अंग मानता हूँ। एक लेखक के रूप में मेरी ज़िम्मेदारी केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रति सजग दृष्टि रखना और उसकी विसंगतियों को पहचानना भी है। हालाँकि, मेरे व्यक्तिगत अनुभव मेरी रचनाओं में सीधे-सीधे नहीं आते। वे एक व्यापक संवेदना में रूपांतरित होकर पात्रों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं। मैं यह मानता हूँ कि जब कोई रचना केवल ‘व्यक्तिगत’ रह जाती है, तो उसकी सीमाएँ संकुचित हो जाती हैं; लेकिन जब वही अनुभव ‘सामूहिक’ भाव में ढल जाता है, तो वह पाठकों के साथ गहरा जुड़ाव स्थापित कर पाती है। इसीलिए मेरे लिए लेखन केवल अनुभवों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि अपने अनुभवों को व्यापक मानवीय संदर्भ में रूपांतरित करने की प्रक्रिया है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन:
‘डूबा हुआ किला’ जैसी पुरस्कार-विजेता कृति की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
संजीव जयसवाल:
‘डूबा हुआ क़िला’ मेरी बचपन की एक बहुत गहरी और अविस्मरणीय स्मृति से निकला है। मेरा पैतृक क्षेत्र धौरहरा ज़िला लखीमपुर-खीरी में शारदा नदी के निकट बसा हुआ है। यह नदी अपने कटान के लिए कुख्यात थी और बरसात के दिनों में कई कई गाँवों को निगल जाती थी। मेरे बचपन में शारदा की तेज़ कटान में एक राजा का पूरा क़िला नदी में समा गया था। अशरफ़ियों से भरी डेगियाँ उफनती नदी में बिखर गई थीं, लेकिन रात के अँधेरे और तेज़ बहाव के कारण कोई कुछ नहीं बचा पाया।
वह घटना मेरे लिए सिर्फ़ एक क़िले के डूबने की कहानी नहीं थी। वह समय की क्षणभंगुरता, मानव अहंकार की नश्वरता और प्राचीन धरोहरों की उपेक्षा का भी प्रतीक थी। यह कहानी दशकों तक मेरे मन में घूमती रही। जब मैंने इसे उपन्यास का रूप देने का फ़ैसला किया, तो मैंने इसमें काल्पनिक तत्त्व जोड़े—एक ख़ज़ाना, जो अब डाकुओं के क़ब्ज़े में है। क़िले में कई प्राचीन अनमोल कलाकृतियाँ भी है जिन्हें डाकू अपने अज्ञानतावश नष्ट किए दे रहे। कुछ बच्चे अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से न सिर्फ़ ख़जाने को बचाते हैं, बल्कि डाकुओं को बिना हिंसा के आत्मसमर्पण के लिए भी प्रेरित करते हैं। इस कथानक के पीछे विनोबा भावे जी द्वारा चंबल घाटी के डाकुओं को आत्मसमर्पण करवाने की घटना भी प्रेरणा बनी।
इस उपन्यास के माध्यम से मैं बच्चों को यह संदेश भी देना चाहता था कि हमारी प्राचीन इमारतें और धरोहरें सिर्फ़ पत्थर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इतिहास का जीवंत हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित करना हर पीढ़ी का दायित्व है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन:
बाल साहित्य के क्षेत्र में आपने बहुत व्यापक काम किया है। आज के बच्चों के लिए लिखते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?
संजीव जयसवाल:
बाल-साहित्य लिखना जितना सरल दिखाई देता है, उतना सरल है नहीं। इसके लिए सबसे पहले बच्चों की दुनिया को गहराई से समझना पड़ता है—उनकी जिज्ञासाएँ, उनकी भाषा, उनके सपने, उनके छोटे-छोटे डर और उनकी मासूमियत को आत्मसात करना होता है।
इसके लिए सबसे ज़रूरी है बच्चों के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव। जब तक आप उनके साथ समय नहीं बिताएँगे, उनकी बातें नहीं सुनेंगे और उनकी आँखों से दुनिया नहीं देखेंगे, तब तक उनके लिए सच्चा और प्रभावशाली लिखना मुश्किल है। आज के बच्चों के लिए लिखते समय मैं तीन मुख्य बातों पर विशेष ध्यान रखता हूँ: पहला—मनोरंजन को प्राथमिकता देना। अगर कहानी मनोरंजक नहीं हुई, तो बच्चा उसे पढ़ेगा ही नहीं। शिक्षा या संदेश बाद में आना चाहिए, वह भी कहानी के प्रवाह में अप्रत्यक्ष रूप से घुला हुआ। दूसरा—भाषा इतनी सरल और सहज हो कि बच्चा बिना किसी अड़चन के पढ़ सके, लेकिन शब्दों में गहराई हो, ताकि पढ़ने के बाद कुछ सोचने को भी मिले। तीसरा—बच्चों को हमेशा नायक/नायिका बनाना। चाहे वह 6 साल का हो या 14 साल का, कहानी में उसे केंद्र में रखना चाहिए, ताकि वह ख़ुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करे तभी वह रचना के साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकेंगे।
आज का बच्चा बहुत समझदार और तर्कसंगत है। वह तुरंत पहचान लेता है कि रचना बनावटी है या दिल से लिखी गई है। इसलिए कहानी में लॉजिक, विश्वसनीयता और भावनात्मक सच्चाई बनाए रखना भी मेरे लिए बहुत ज़रूरी होता है। कुल मिलाकर बाल-साहित्य लिखना मेरे लिए बच्चों के लिए लिखना नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर लिखने जैसा अनुभव है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आपकी कई कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान को आप कैसे देखते हैं?
संजीव जयसवाल:
यह निश्चित रूप से संतोष और प्रसन्नता का विषय है, लेकिन मैं इसे केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए यह साहित्य की उस शक्ति का प्रमाण है, जो भाषा और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ती है। आज का समय ‘ग्लोबल विलेज’ का है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद अत्यंत आवश्यक हो गया है। साहित्य इस संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है। जब किसी भाषा की रचना दूसरी भाषा में अनूदित होती है, तो वह केवल शब्दों का अनुवाद नहीं होता—वह संस्कृति, संवेदना और दृष्टिकोण का भी आदान-प्रदान होता है।
बच्चों की मूल भावनाएँ—जैसे प्रेम, जिज्ञासा, भय, आनंद—सभी जगह एक जैसी होती हैं, तभी बाल-साहित्य आसानी से वैश्विक स्तर पर जुड़ाव स्थापित कर पाता है। इसलिए मैं इसे अपनी सफलता से अधिक साहित्य की सार्वभौमिकता की सफलता मानता हूँ।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
व्यंग्य लेखन में आपकी शैली तीखी और प्रभावशाली है। क्या आपको कभी इस कारण विवादों का सामना करना पड़ा?
संजीव जयसवाल:
व्यंग्य का मूल स्वभाव ही है—प्रश्न उठाना, विसंगतियों को उजागर करना और समाज को आईना दिखाना। जब आप सच को सीधे और तीखे रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो कुछ असहजता स्वाभाविक है। किन्तु मेरा प्रयास हमेशा रहता है कि मेरा व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि प्रवृत्तियों पर प्रहार करे। मेरा उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि झकझोरना होता है—ताकि वह आत्ममंथन कर सके।
जहाँ तक विवादों का प्रश्न है, वे कभी-कभी सामने आते हैं, लेकिन यदि आपकी नीयत स्पष्ट और दृष्टिकोण संतुलित है, तो आप उनसे विचलित नहीं होते। मेरे एक व्यंग्य को पढ़कर एक बार एक माफ़िया का धमकी भरा फोन आया था लेकिन जिस दृढ़ता के साथ मैंने उसका सामना किया उससे वह निरुत्तर होकर शांत हो गया था।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आज के डिजिटल युग में साहित्य और पढ़ने की आदतों में जो बदलाव आया है, उसे आप कैसे देखते हैं?
संजीव जयसवाल:
अक़्सर यह कहा जाता है कि पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन मैं इससे पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। मेरा मानना है कि पाठक कम नहीं हुए हैं—उनके पढ़ने के माध्यम बदल गए हैं।
आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ई-बुक्स, ऑडियोबुक्स और सोशल मीडिया के माध्यम से साहित्य अधिक व्यापक स्तर पर पहुँच रहा है। एक-एक कहानी को लाखों लोग पढ़ और सुन रहे हैं।
हाँ, दो महत्त्वपूर्ण बदलाव अवश्य आये है। पहला आज के पाठक के पास समय सीमित है। इसलिए वह संक्षिप्त, प्रभावशाली और सारगर्भित अभिव्यक्ति चाहता है। यह बदलाव रचनाकार के लिए एक चुनौती भी है और अवसर भी। दूसरा आज वैश्विक स्तर पर शिक्षा की पद्धति, जीवनशैली तथा लेनदेन, कार्य-व्यवहार सब डिजिटल होता जा रहा है-इसलिए आज की पीढ़ी का काग़ज़ के साथ संपर्क कम से कमतर होता जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उन्हें काग़ज़ की पुस्तकों को पढ़ने में असुविधा होती हो, तभी वे डिजिटल माध्यम से पढ़ना पसंद कर रहे हैं। यदि हम समय के साथ अपने लेखन को आधुनिक तकनीक के साथ ढाल लें, तो साहित्य की पहुँच पहले से कहीं अधिक व्यापक हो सकती है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
नवोदित लेखकों और विशेषकर बाल साहित्य लिखने वालों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
संजीव जयसवाल:
नवोदित लेखकों को मेरी सबसे पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण सलाह यही है कि वे अधिक से अधिक पढ़ें। पढ़े बिना अच्छा लिखना लगभग असंभव है। जितना विविध साहित्य आप पढ़ेंगे—अपनी भाषा का, दूसरी भाषाओं का अनुवाद, क्लासिक और समकालीन—उतनी ही परिपक्वता और गहराई आपके लेखन में आएगी।
दूसरी सलाह—धैर्य रखें। लेखन कोई त्वरित सफलता का खेल नहीं है। यह एक लंबी साधना है। शुरूआती रचनाएँ अस्वीकृत होना स्वाभाविक है। मैं ख़ुद अपनी शुरूआती चार-पाँच कहानियाँ अस्वीकृत होने के बाद निराश हुआ था, लेकिन बाद में राह आसान हो गई।
बाल साहित्य लिखने वालों के लिए ख़ास सलाह: बच्चों को कभी भी कम न आँके। वे आज बहुत समझदार, तर्कसंगत और तकनीकी से लैस हैं। डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म पर वे पलक झपकते ही असली नक़ली की पहचान कर लेते हैं। इसलिए उनके साथ समय बिताएँ, उनकी बातें सुनें, उनके खेल देखें और उनकी आँखों से दुनिया देखने की कोशिश करें। जो लिख रहे हैं, उसमें पूरी ईमानदारी बरते और कृत्रिमता से बचने की कोशिश करें।
अंत में एक और महत्त्वपूर्ण बात—जो कुछ भी लिखें, उसे लिखने के बाद एक-दो महीने के लिए अलग रख दें। फिर जब दोबारा पढ़ेंगे, तो बहुत सारी कमियाँ दिखेंगी। काट-छाँट करके रचना को निखारें। अच्छा संपादन अच्छे लेखन से ज़्यादा ज़रूरी है।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
वर्तमान में आप किन नए प्रोजेक्ट्स या रचनाओं पर कार्य कर रहे हैं, और पाठक आगे क्या उम्मीद करें?
संजीव जयसवाल:
लेखन मेरे लिए एक सतत प्रक्रिया है—एक ऐसी साधना, जो कभी समाप्त नहीं होती। वर्तमान में मैं कुछ नई विज्ञान कहानियों पर कार्य कर रहा हूँ, जिसमें गहन शोध और कल्पना का समन्वय है। मेरी योजना प्रौढ़ पाठकों के लिए एक अच्छे विज्ञान कथा संग्रह को तैयार करने की है।
इसके अतिरिक्त बाल-साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नई अवधारणाओं पर काम चल रहा है, जिन्हें आने वाले समय में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की योजना है।
मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि हर नई रचना अपने आप में कुछ नया और सार्थक लेकर आए। पाठक भी मुझसे ऐसी रचनाओं की अपेक्षा करते हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें कुछ सोचने के लिए भी प्रेरित करें। मेरी पूरी कोशिश है कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सकूँ।
डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे:
आपने अपने बहुमूल्य समय में से हमारे लिए समय निकाला इसके लिए हम आपका हृदय से आभार व्यक्त करते हैं साथ ही आपकी साहित्यिक सृजन यात्रा अनवरत चलती रहे यही कामना करते हैं। धन्यवाद।