मीडिया कवरेज के चलते

15-12-2019

मीडिया कवरेज के चलते

धर्मपाल महेंद्र जैन

हमारे एमेले (एमएलए) ग्रामीण क्षेत्र के हैं। वे हैं घाघ, पर उन्हें कोई घास नहीं डालता, उनके साथ कोई फोटो नहीं खिंचवाता। शहर के एमेले तिकड़मी हैं, उनका नाम अख़बारों में रोज़ काला होता है, मंत्रीवरों के साथ फोटो छपते हैं। एक दिन जब हमारे ग्रामीण एमेले के दुःख का घड़ा भर गया तो वह मुझसे बोले लेखकजी, अपने गाँव में कोई कार्यक्रम रखें, किसी मंत्री को बुलाएँ। कुछ अपना, कुछ गाँव का नाम रोशन करें। मैंने कहा दो महीने बाद अपने यहाँ गधों का मेला भरने वाला है, उसका उद्घाटन मंत्रीजी से करवा लें तो कैसा रहे। आज तक गधों के मेले का उद्घाटन गधे ने नहीं किया। एकदम ओरिजिनल आइडिया था, सो चल निकला। 

हमारा प्रतिनिधि मंडल सबसे पहले संस्कृति मंत्री के घर पहुँचा। हमने उनसे मुख्य अतिथि बनने का अनुरोध किया तो वे सकपका गए बोले, गधे का संस्कृति से क्या लेना देना, जबकि वे जानते थे कि संस्कृति गधों की वज़ह से ही टिकी है। मैंने कहा सर, ये विशेषण वाले गधे नहीं हैं, ये रियल वाले गधे हैं, इनसे संस्कृति को कोई ख़तरा नहीं है। उन्हें कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला है तो पुरस्कार वापसी का शर्मनाक टंटा होगा ही नहीं। संस्कृति मंत्रालय उनका मान-सम्मान करेगा तो मानवीय गधों की चेतना जागृत होगी सर, जानवर आपका मान-सम्मान करेंगे तो बुद्धिजीवी उनका अनुकरण करेंगे सर। खेद, वे हमारे धर्मनिरपेक्ष सोच को नहीं समझ पाए।

हम पशुधन मंत्री के घर पहुँचे। घर के पीछे विशाल तबेला था, जर्सी गायें थीं, बफेलो की मुर्रा भैंसें थीं, कैनेडियन गूस थे पर गधे नहीं थे। प्रेसिडेंट ट्रंप अपनी ही कैबिनेट के नामांकन पूरे नहीं कर पा रहे थे तो विदेशी गधे भारत तक कैसे आ पाते। गधों के मेले में आने का आमंत्रण उन्हें घर वापसी जैसा लगा। बोले गणतंत्र दिवस की परेड में गधों की झाँकी निकालने में पशुधन मंत्रालय बहुत बिज़ी है, इस बार माफ़ करें। एमेले जी हमें तीसरी जगह ले गए, वे राज्यमंत्री थे, बिना विभाग के। वे गाड़ी की स्टेपनी की तरह कहीं भी फिट हो सकते थे, वे भी लटके-झटके बताने लगे, उनकी ना-ना और नो-नो  बंद ही नहीं हो रही थी। हमें बैरंग उठता देख उनका दबा वीआईपी मन फटाक से बाहर निकल आया। वे गंभीरता से कहने लगे गधों का इतना बड़ा मंच है तो आना ही पड़ेगा, उनके लिए एडजेस्ट करेंगे। इस तरह, वे उद्घाटन करने के लिए तैयार हो गए। सरकार ने पहली बार रियल गधों को इज़्ज़त बख़्शी।  

जनपद में उत्सव की तैयारी होने लगी। बच्चों में मस्ती थी, जवान हिलोरे ले रहे थे। सड़कों पर फिर से छिड़काव हो गया था। जीएसटी वालों के सौजन्य से दुकानदारों ने स्वागत द्वार बनवा दिए थे। गधे इसी मार्ग से मेला प्रागंण में पहुँच रहे थे। उद्घाटन दिवस का प्रातःकाल हुआ, लोक निर्माण विभाग के सारे मज़दूरों को मैदान में बैठे रह कर तालियाँ बजाने का काम मिल गया। अध्यापकों ने मंच के पास बच्चों की थप्पियाँ जमा दीं और उन्हें नारे रटवाने लगे। बालिकाएँ जन-गण-मन की रिहर्सल कर रही थीं, ट्रक, ट्रैक्टर और बस वाले मन मारकर दूर-दराज से श्रोताओं को भर-भर कर ला रहे थे। लाउडस्पीकर वाले हलो, हलो माइक टेस्टिंग कर ‘पल्लो लटके’ की सीडी चला रहे थे। प्रजातंत्र में पहली बार वास्तविक गधों को मान्यता मिली थी। गधे हिनहिना रहे थे, गाँव की शक्ल राजधानी जैसी हो गई थी। सब आमंत्रित, अनामंत्रित लोग आ चुके थे, बस वीआईपी के आने की देर थी।

मंत्रीजी को हार-फूल चढ़ाने वाले भविष्य के कृपाकांक्षियों की मैं सूची बना रहा था। चंदे के हिसाब से किसी का नाम ऊपर कर रहा था, किसी का नाम नीचे डाल रहा था। फोटोग्राफर को ख़ास-ख़ास भक्तों की भोली सूरतें बता दी थीं। वीआईपी राज्यमंत्री को हमने महामहिम मंत्री के पदनाम से संबोधित करना तय किया था। यही एक सम्मान था जो उनकी आत्मा, अंतर्आत्मा और परमात्मा तीनों को प्रसन्न कर सकता था। उनके सम्मान में कई संस्थाओं का रातोंरात प्रसव हो गया था। सबके दो-दो शब्द तैयार थे। गधों ने एमेलेजी में विश्वास भर दिया था कि इस आयोजन से विधानसभा क्षेत्र में उनकी तूती बोलकर रहेगी। छोटे कुत्ते भौंकना बंद कर देंगे और बड़े कुत्ते काटना कम कर देंगे। मंत्रीजी का आशीर्वाद पाने विरोधी धड़े वाले दौड़-दौड़ कर काम कर रहे थे। वे वधू पक्ष वालों की तरह सत्ता-पुत्र के आने का इंतज़ार कर रहे थे।

एमेलेजी की जीप आते दिखी, उन्हें देख कार्यकर्ता जहाँ थे वहीं से वंदन करने लगे। साथ आए कलेक्टर और एसपी गधों को सँभालने में लग गए। एमेलेजी से मालूम हुआ कि टीवी चैनलों पर गधों के मेले पर सम्मोहक चर्चा चल रही है। मेले ने व्यापक मीडिया कवरेज दिया है। उन्हीं से मालूम हुआ कि आज तीनों मंत्रीगण गधों के इस समागम में पधार रहे हैं। ऐसे मीडिया कवरेज के चलते हम प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को बुलाते तो वे भी आ जाते, अब अगले साल सही। राजनेताओं को भारी-भरकम पब्लिसिटी मिले तो क्या गधे, क्या घोड़े। 

घोषणा होने लगी, जनपद के शानदार निवासियों, माताओं और बहनों, हमारे अनुरोध पर तीन-तीन मंत्री इकट्ठे आ रहे हैं। जो लोग गधों को देखने नहीं आ रहे थे वे भी घर से दौड़े-दौड़े आने लगे, जय-जयकार करने लगे। सड़कों की धूल धन्य होकर गुलाल हो गई। एमेलेजी हमें एक और ले जाकर मंत्रणा करने लगे, उन्होंने गंभीर होकर पूछा अब क्या करें? हार-फूल तो इधर-उधर करके काम चला लेंगे। मैं अध्यक्षता करने वाला था अब आभार प्रकट कर दूँगा, सांसद जी से अध्यक्षता करा लेंगे। पशुधन मंत्रीजी को मुख्य अतिथि बनाना होगा। संस्कृति मंत्रीजी को मुख्य वक्ता बना देंगे पर राज्यमंत्रीजी का कुछ ठीक करो। राज्यमंत्रीजी को ठिकाने लगाने की ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गई। मैं सोचने लगा, कभी ठस बुद्धि से कभी सरकारी बुद्धि से। सरकार इतनी तेज़ी से पद घड़ती है जैसे देश में बच्चे पैदा होते हैं। एक मुख्य संचालक, फिर अतिरिक्त मुख्य संचालक, उसके पाँच-छः उपमुख्य संचालक, उनके सौ-सवा सौ सहायक मुख्य संचालक। संचालक तो गधों जैसे जगह-जगह हो जाते हैं। 

कारों का क़ाफ़िला आया, हमने मंत्रीवरों को हार पहनाये, उन्होंने वे हार गधों को अर्पित किए और उत्सवधर्मी बन कर गधों के साथ फोटो खिंचवाये। बिना जनसेवा के जनसेवक कहलाने के लालायित लोग गला फाड़-फाड़ कर जय-जयकार कर रहे थे। मर्यादा पुरुषोत्तम वरिष्ठ मंत्रियों के गुणगान के बाद मैंने राज्यमंत्रीजी को आमंत्रित किया। मैंने कहा वे आज के विशेष अतिथि हैं, वे बीज वक्तव्य देंगे। उनकी स्पीच मैंने लिखी थी। वे बोले हमारे देश में गधे ही काम करते हैं, गधों में बेरोज़गारी भी नहीं है। हमारी सरकार सहिष्णु है, हम बुज़ुर्ग गधों को पेंशन देंगे और ग़रीब गधों के लिए न्यूनतम मासिक आय सुनिश्चित करेंगे। मेले में गधे बहुत बिके और ऊँचे भावों पर बिके। जनता बहुत ख़ुश हुई।

छपते-छपते - मुख्यमंत्रीजी ने अभी घोषित किया है कि हमारे एमेलेजी को तत्काल प्रभाव से बिना विभाग का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया है और मैं उनका विशेष अधिकारी बनाया गया हूँ, जय हो।    

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