मन्दिर के दिये -सा

15-09-2019

मन्दिर के दिये -सा

डॉ. कविता भट्ट

विदाई में तेरे चेहरे की सलवटें
मुझे सताए जैसे बेघर को गर्म लू।


तू रो न सका, मेरे आँसू न रुके, 
पहाड़ी घाटी में उदास नदी-सा तू।


छोड़ रहा था चुन्नी, काँपते हाथों से,
सुना था, पुरुष लौह स्तम्भ हैं हूबहू।


तेरे मन के कोने मैंने भी रौशन किए,
मेरी नज़र में मन्दिर के दिये -सा तू।


चार क़दम में कई जीवन जी लिये,
अमरत्व को उन्मुख अब यौवन शुरू।

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