कविता भट्ट - 1

01-03-2019

कविता भट्ट - 1

डॉ. कविता भट्ट

दोहे

1.
कोई भी अपना नहीं, ना ही जाने पीर।
ओ मन अब तू बावरे,काहे धरे न धीर।।

2.
ऐसे तुम रूठे पिया, ज्यों मावस में चाँद
आ जाओ इक बार तो, घोर रात को फाँद।

3.
कंटक-पथ पर चल रही, तेरी यादें साथ।
कुछ भी जग कहता रहे, तू न छोड़ना हाथ।

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