हे प्रिय!

01-03-2020

हे प्रिय!

डॉ. कविता भट्ट

हे प्रिय! मेरा यह जीवन
जेठ माह की पहाड़ी पगडण्डी-सा
जला दिया गया एक-एक वृक्ष
पोखर सूखे, धारे सूखे
मर गयी जिजीविषा
दूर-दूर तक पंथी न पंछी
तुम मेरे संग चलना तो दूर
मुझे निहारना भी नहीं चाहते। 

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