धर्मशाला का उपनगर मैक्लोडगंज और धर्मकोट

15-07-2020

धर्मशाला का उपनगर मैक्लोडगंज और धर्मकोट

डॉ. मधु सन्धु

कभी पंजाब बड़े क्षेत्रफल का बृहद प्रदेश था। सितंबर1966 में इसका विभाजन हो गया। कुछ भाग हिमाचल में चला गया और बाक़ी हरियाणा और पंजाब बना दिये गए। देव भूमि हिमाचल मोहक पहाड़ियों, बहते झरनों, लहलहाती वनस्पतियों, शीत हवाओं का ख़ूबसूरत प्रदेश है तो पंजाब हलचल भरा पूर्णत: मैदानी प्रांत है। पर कुछ ऐसा है कि पड़ोसी  राज्य हिमाचल की पर्वत शृंखलाएँ पंजाबियों को पुकारती रहती हैं, उनका सौंन्दर्य बार-बार आमंत्रित करता है और अवसर मिलते ही वे चल पड़ते हैं दुर्लभ आनंद के पल सहेजने। 

आज कारोना महामारी, क्वारंटाइन, कर्फ़्यू, लॉकडाउन, भारत-चीन एल. ए.सी. के सीमा विवाद से उत्पन्न भीष्म तनाव के समय ने सबको घरों में बंद कर दिया है। ऐसे में बीते दिनों की यादें बार-बार ताज़ा हो रही हैं।    

वर्ष 2014 की बात है। बच्चों की परीक्षाएँ हो चुकी थी। छुट्टियाँ पड़ चुकी थी। होली के दिन थे। होली में तो तीन- चार दिन के लिए बाज़ार भी बंद हो जाते हैं। उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु आने को उतावली थी। कहाँ घूमने जाया जाये? मंसूरी जाना चाहते थे, लेकिन समाचार बता रहे थे कि पर्यटकों की भीड़ ने ट्रैफ़िक जाम लगा रखे थे। शिमला का सोचा, पर सुना कि वहाँ पानी की बेइन्तहा किल्लत चल रही है। तब प्रकृति की गोद में बसे, हिमाचल की धर्मशाला से आगे एक छोटे से पर्यटन स्थल/ गाँव धर्मकोट जाने का निर्णय लिया गया। अमृतसर से पठानकोट– कोई सौ किलोमीटर, वहाँ से धर्मशाला लगभग पचासी किलोमीटर, वहाँ से मैक्लोडगंज और फिर धर्मकोट और फिर देव कॉटेज नाम का बृहदाकार होटल।

दो गाड़ियों में हम आठ लोग पूरी रफ़्तार से सुबह सवेरे चल दिये। धर्मशाला और मैक्लोडगंज के बीच एक गाड़ी में ख़राबी आ गई। मस्ती के बीच में तनाव, रफ़्तार के बीच ठहराव- अलग ही मंज़र था। कुछ समझ नहीं आ रहा था ? जी.टी. रोड– हर ओर तेज़ी से गुज़रती गाड़ियाँ — चारों ओर बिखरा अपरिचय - किस से बात करें-  सर्विस स्टेशन का पूछें? स्थानीय लोगों की मदद से पता चला कि हुंडाई का सर्विस स्टेशन कुछ ही दूर है। ख़ैर! दो लोग वहाँ रुके और बाकी दूसरी गाड़ी में बैठ गंतव्य की ओर चल दिये। क्लच प्लेट्स की समस्या निकली। तीन चार घंटे तक वह गाड़ी भी पहुँच गई।

धर्मशाला को हिमाचल की शीतकालीन राजधानी कहा जाता है। यह कांगड़ा ज़िले का मुख्यालय है। दो सहस्त्राब्दियों तक यहाँ बटोच राजाओं का शासन रहा। कालांतर में अंग्रेज़ों ने यहाँ कब्ज़ा कर लिया। कहते हैं कि साढ़े बारह सौ से दो हज़ार मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह शहर 1849 में कांगड़ा स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया था और फिर तेज़ी से इसका विकास होने लगा। 1867 में नगर परिषद बनी। 1926 में इंटर कॉलेज और 1935 में सिनेमा हाल खुला। 

मैक्लोडगंज धर्मशाला का उपनगर है। तत्कालीन पंजाब के लेफ़्टिनेंट गवर्नर डेविड मैक्लेओड के नाम पर इसका नाम मैक्लोडगंज रखा गया। बौद्ध धर्म के सर्वोच्च धर्म गुरु 14वें दलाई लामा और उनके समर्थक तिब्बती शरणार्थियों के कारण यह वैश्विक पहचान लिए है। 1960 से यहाँ तिब्बत के दलाईलामा का निवास स्थल और प्रशासनिक मुख्यालय है। यह एक तरह से निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। मैलक्लोडगंज के दक्षिण पश्चिम भाग में दलाईलामा का आधिकारिक निवास है। इस कॉम्प्लेक्स में तिब्बती अजायबघर, नामाग्याल और त्सुगलद खंग मंदिर भी है। यहाँ हर ओर अपनी पारंपरिक वेशभूषा में दलाई लामा जैसे बौद्ध संन्यासी घूम रहे थे। शायद इसीलिए मैलक्लोडगंज को लिटल लहासा भी कहते हैं।   मैलक्लोडगंज में इतनी भीड़ कि पूछो मत। सड़कें जाम, व्यवस्था बनाने में जुटी ट्रैफ़िक पुलिस। शहर तो शहर ही होता है, मैदानी हो या पहाड़ी! ऊँचे पहाड़ों पर बसे मेकलोडगंज में पैरागलाईडिंग प्रतियोगिताएँ भी होती हैं और यहाँ पैरागलाईडिंग का विश्वकप भी करवाया जाता है।   

धर्मशाला और मैक्लोडगंज तो पहले भी जा चुके थे, लेकिन इस बार हम धर्मकोट के लिए निकले थे- एक छोटा सा योग ग्राम या हिप्पी ग्राम- जीवन की हलचल और ऊहापोहों से दूर प्रकृति का शुद्ध जादुई अंचल- शांत, निस्तब्ध । यहाँ न सड़कों का जाल है, न लोगों की भीड़, न भोज्य स्थलों की भरमार। धर्मकोट का रास्ता था तो कुछ ही मिनटों का, लेकिन बहुत आसान नहीं था। पहले तो मैक्लोडगंज से दोनों ओर के छोटे-बड़े मकानों से ढकी, एक संकरी सी गलीनुमा सड़क और फिर देव कॉटेज का जोख़िम भरा प्रवेश द्वार । अक्सर होने वाली वर्षा आकाशचुंबी देवदारों से ढके मिट्टी के गीले पहाड़ी रास्तों को ओर भी कठिन कर रही थी। घूमने जाने के किए हर बार गाड़ी निकालना कठिन था। स्थानीय जगहों पर घूमने के लिए टैक्सी ही ठीक लग रही थी। यह एक बड़ा होटल था। खुले-खुले उपवन थे। बच्चों के लिए झूले थे। उनके लिए बैट बाल खेलना मज़ेदार था और हमारे लिए चहल- क़दमी करना। नीचे योग स्थल था। शायद ‘हिमालयन अयंकर योग केंद्र’। हरियाली से भरा उपवन यहाँ भी लहलहा रहा था । दूर दूर तक हरीतिमा ही दिख रही था। कमरे हट्स की तरह थे। हमने ट्रिप्प्ल- स्टोरी हट का चुनाव किया। तीनों तल्लों पर अब हमारा वर्चस्व था। ख़ास बात यह कि नन्हें सर्वज्ञ को अपना एक मित्र मिल गया और स्वाति-गौतम का एक मित्र परिवार भी इसी होटल में रुका हुआ था। उन दिनों आज जैसी इंटरनेट की सुविधा नहीं होती थी। हमने होटल से पासवोर्ड लिया और अब सभी के मोबाइल में वाई- फाई एक्टिव था। रूम सर्विस की सुविधा भी थी। उस शाम अचानक घनघोर बादल घिर आए। हम सभी होटल के कमरों में दुबकने ही वाले थे कि देखा होटल वाले हर कमरे के दरवाज़े के हैंडल पर दो-दो छाते लटका गए हैं। फिर क्या था। छाते पकड़ हम सभी इधर- उधर डोलने लगे, बारिश के मज़े लेने लगे। बहुत बार भले ही क्षणों के लिए हम बादलों के बीच थे। इस बार हम घूमने नहीं, एक शांत वातावरण में आराम करने आए थे। शहराती ऊहापोहों से थक विश्राम के लिए आए थे। सारा समय देव कोटेजिज़ में ही बिताना चाहते थे।  

खिड़की से, छत से, लान से हिप्पीनुमा अंग्रेज़ हाथ में कुछ सामान लिए छोटी-छोटी पगडंडियों से अक़्सर पहाड़ पर चढ़ते दिखाई दे जाते। देखा तो दूर हरियाली में छोटे छोटे कॉटेज वाला एक गाँव था। कहते हैं कि यहाँ विदेशी लोग महीनों के हिसाब से रहने के लिए, विश्राम के लिए आते हैं और कमरा- वाशरूम बड़े सस्ते दामों पर मिल जाते हैं। इसी लिए धर्म कोट हिप्पी ग्राम भी कहलाता है। 

धर्मकोट का आध्यात्मिक महत्व भी कम नहीं। वेदों ने ही नहीं महात्मा बुद्ध ने भी योग की महत्ता को स्वीकारा है। योग मन, शरीर और आत्मा- तीनों के स्वास्थ्य लाभ का साधन है। धर्मकोट में अनेक योग सेंटर हैं। विदेशी यात्री यहाँ आध्यात्मिक परिवेश और योग के लिए ही आते हैं। देशी- विदेशी लोग 100 घंटे, पंद्रह दिन, महीना, दो महीने के लिए योग केंद्र में आते हैं- योग थैरेपी के लिए भी और योग शिक्षक योग प्रशिक्षण के लिए भी। ख़ास बात यह है कि उनके खाने- पीने और रहने की व्यवस्था योग केंद्र में होने का प्रावधान भी है। इसीलिए धर्म कोट योग ग्राम कहलाता है।  

अगले रोज़ हम नड्डी पहुँचे। तेज़ रफ़्तार हवाएँ सुरीली सीटियाँ बजा रही थी। सूर्यास्त का परिदृश्य और टेलीस्कोप से धोलाधार रेंज को देखना, बर्फ़ के पहाड़ और धुँए की तरह उठते बादल देखना, वॉटर फ़ाल के अनेकानेक दृश्य एक साथ- सब काफ़ी रोमांचक था। वापसी पर वही मैक्लोडगंज का भीड़ भरा चौराहा। खाने-पीने की ढेरों चीज़ें। गोलगप्पे, आलू-टिक्की का आकर्षण ही ऐसा था कि रुकना ही पड़ा। 

कुछ देर मैक्लोडगंज की भीड़ भरी मार्केट में घूमना भी बनता ही था। यह तिब्बतीय संस्कृति, शिल्प, दस्तकारी, कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है या यूँ कहिए कि मैक्लोडगंज के बाज़ारों में तिब्बत बसता है। यह गोलाकार सा बाज़ार था।  बड़े-बड़े शो-रूम, दुकानें और थड़ों/ फ़ुटपाथ पर भी सामान बिक रहा था- तिब्बती टोपी, चट्टाई, कालीन, शाल, कागडा चाय, लकड़ी- धातु- मोती- रंगीन पत्थर और गुरियों के गहने, नक्काशीदार घरेलू सजावट का सामान, बुद्ध और हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ। बहुत सी दुकानदार तिब्बती महिलाएँ परंपरित वेश- भूषा में थी। यात्रा के स्मृतिचिन्ह के रूप में हमने भी कुछ ख़रीददारी की। एक बात स्पष्ट थी कि यहाँ ख़रीदारी के लिए मोल-भाव करना तो आना ही चाहिए।   

वापसी ख़ूब रोमांचक रही। सुबह के नाश्ते और थोड़ी मस्ती के बाद वापसी का सफ़र शुरू हुआ। हमारा प्रथम पड़ाव धर्मशाला का क्रिकेट स्टेडियम रहा। स्टेडियम तो खुला था- बहुत बड़ा, मोहक, सुंदर, आकर्षक: लेकिन कोई मैच नहीं चल रहा था। 27000 दर्शक क्षमता वाला यह स्टेडियम 2003 में स्थापित हुआ था। यहाँ भिन्न ऐंगलों से सर्वज्ञ ने फोटो उतरवाई, जिन्हें आज भी वह इन्स्टाग्राम पर डाल मित्रों को दिखा अपना क़द ऊँचा किया करता है। 

दूसरा पड़ाव रावी नदी के किनारे और पठानकोट से कोई पंद्रह-सोलह किलोमीटर पहले का रणजीत सागर डैम के पास बना पिकनिक स्पॉट माधोपुर और शाहपुर कंडी रहा। यह स्थल अपने चुम्बकीय आकर्षण से पर्यटकों को खींचने की अद्भुत क्षमता रखता है। हमें अब लंच करना था। पानी के किनारे का रेस्टोरेन्ट और बच्चों ने भी एकदम मुहाने का मेज़ चुना। उनका ध्यान खाने की ओर कम और भिन्नाकार रंगबिरंगी मछलियों की अठखेलियों की ओर अधिक था। 

बाहर पिंजरों में खरगोश देख उनका उत्साह द्विगुणित हो रहा था। पास ही अलग तरह का लम्बा-लम्बा, ताज़ा, लहलहाता, हरा, कोमल घास पड़ा था। खरगोशों को घास खिलाना भी कम रोमांचक नहीं था। हमें कौन सी जल्दी थी। अमृतसर ही पहुँचना था। वहीं बैठ गए और उन्हें जी भर कर खेलने दिया। 

रात होने से पहले हम घर पहुँच चुके थे। इस बार न थकान थी, न कोई उनींदापन। ढेर सारी ऊर्जा और गुनगुनी यादों का कुछ ऐसा संचय था जो आज भी मन में तरोताज़ा है।     

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