सबको मार दिया

01-01-2026

सबको मार दिया

शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’ (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

बरसों बाद कॉलेज की दो सहेलियों की संयोग से मुलाक़ात हुई तो . . .

“कैसी है री? रानी!”

“ठीक हूँ।”

“बुझी-बुझी लग रही हो मुझे तो, अवश्य कोई तो बात है।”

“जब से सब को मार दिया मैंने, तब से कोई बात नहीं होती।” 

“क्या बकवास कर रही?” 

“सच में, सब को।”

“तो, अकेली रहती है?”

“हाँ।”

“सब से पहले किसको मारा?” 

“सपनों को।”

“फिर।”

“उम्मीदों को।”

“फिर?”

“इच्छाओं को।”

“फिर?”

“मन को।”

“फिर?”

“फिर तो, कुछ बचा ही नहीं।”

“ओह! मैं तो समझी थी तूने रिश्तेदारों को मार दिया।”

“अरे! नहीं, ख़ुद को मार कर जो औरों को जीवित रखे, वही तो नारी है। 

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