एक बार

शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’ (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

पारुल जब से मायके आई है तब से कुछ न कुछ ख़रीदती रहती है। आज फिर शॉपिंग करके आई . . .

“मम्मा! देखो, यह सब लेकर आई हूँ,” बाज़ार से आते ही पारुल ने कपड़ों का ढेर लगा दिया। 

“इतने सारे कपड़े? दुकान खोलनी है क्या?” 

“नहीं, अपने लिए लाई हूँ।”

“लेकिन इतनों का क्या करेगी?” 

“पहनूँगी, मम्मा! आप तो जानती ही हो, एक ड्रेस को ज़्यादा दिन नहीं पहन सकती। कुछ दिन पहनने के बाद मेरा मन उससे ऊबने लगता है। तो फिर उसको मैं डाल देती हूँ।”

“जैसा तुझको अच्छा लगे कर, लेकिन रिश्तों का ध्यान रखना, एक बार छूट गये तो मुश्किल से पकड़ में आते हैं। उनसे मन को नहीं ऊबने देना।”

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