राजेश ने जैसे ही घर में क़दम रखा, शालिनी ने शिकायतों का पुलिंदा खोल दिया . . .
“सुनो जी!”
“बोलो! सुन रहा हूँ।”
“केवल सुनते ही हो? करते-धरते तो कुछ हो नहीं।”
“क्या करना है बोलो?”
“मम्मी जी को थोड़े दिन मायके भेज दीजिए, मैं तो इनसे परेशान हो गयी, कुछ दिन चैन से तो जीऊँगी।”
“क्यों! अब ऐसा क्या हो गया? जो तुम मम्मी को घर से ही निकाले पर तुल गयी।”
“नाक में दम कर रखा है, कभी कहती है, ये मत करो। कभी वो मत करो। ये मत खाओ, वो मत खाओ। अठाहरवीं सदी की बुढ़िया!”
“बस करो, अपनी हद में रहो। कुछ बोलने से पहले तनिक स्वयं को भी आईने में देख लो, इक्कीसवीं सदी . . .”