घाणी का बैल
शकुंतला अग्रवाल ‘शकुन’
“आज तुझे कैसे फ़ुर्सत मिल गई?” मीता!
“तुझसे मिलने का मन किया तो आ गयी।”
“अच्छा! आ बैठ,” काजल सनेह-भरे स्वर में बोली।
'पहले यह बता, तेरे चेहरे का रंग उड़ा-उड़ा क्यों है?”
“कहाँ? सही तो हूँ।”
“आईने मैं ख़ुद को नहीं देखा तो, जा देख आ, इतनी अस्त-व्यस्त . . .?”
“अपने लिए समय ही कहाँ मिलता है? सबकी फ़रमाइशें पूरी करने में ही समय दिन जाता है।”
“क्यों, घर के काम में, और कोई हाथ नहीं बँटाता क्या?”
“वो, सब नौकरी पर जाते हैं, कमाने के लिए।”
“तो क्या हुआ?”
“मैं नहीं कमाती, घर पर ही रहती हूँ। तो सब काम मुझे ही करने होंते हैं।”
“यह कौन सी बात हुई?”
“ऐसे ही होता है।”
“घाणी का बैल देखा है? जिसको सब हाँकते रहते हैं।”