दरोगा साहब के आते ही कोने में बैठी घिसी हुई मैली धोती में लिपटी बूढ़ी, दीवार का सहारा लेते हुए उठी और अपनी लाठी टेकती उनकी ओर बढ़ी।

"अभी रुको! साहब को पहले बाक़ी काम निपटाने दो," हवलदार रोबदार पर हिकारत भरी आवाज़ में बोला।

"क्या बात है हवलदार?"

"साहब ये सरकारी योजना में दिया गया गैस सिलिंडर बाज़ार में बेचने की कोशिश कर रही थी। ये लोग ऐसे ही हैं, स्कीम का लाभ ले लेते हैं और फिर से लाभ लेने के लिए पहले मिली चीज़ बेच डालते हैं। ऐसे ही लोगों के कारण हमारी योजनाएँ विफल हो जाती हैं।"

"क्यों अम्मा स्कीम का सिलिंडर बेच रही थी तुम?" दरोगा जी ने नरम आवाज़ में पूछा।

"दरोगा साहब, दो महीने हुए इस सिलिंडर को आए, हम एक रोज़ इससे चूल्हा न जला पाए," वो रुआँसी आवाज़ में बोली।

"क्यों चूल्हा तो मिला होगा साथ में, कोई दिक्क़त है उसमें?

"नहीं बेटा, चूल्हा सिलिंडर तो सब ठीक है, हमारे पास पकाने को कुछ अनाज ही ना रहा।"

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