ग़रीब की जुगत

01-12-2019

ग़रीब की जुगत

भावना सक्सैना 

सात-आठ बरस का वह कमज़ोर सा बालक सड़क के बीचों-बीच था।

तेज़ रफ़्तार गाड़ियों की हेडलाइट की तीव्र रोशनी से या डर से बीच में ही बेहोश होकर गिरा तो एक गाड़ी उसे बचाते-बचाते भी उसके बहुत क़रीब आकर रुकी।  पीछे से आ रही दूसरी गाड़ी भी लगभग उससे टकराती हुई रुकी। हॉर्न और घिसटते टायरों की ध्वनि वातावरण में गूँज गई और कई गाड़ियाँ एक के पीछे एक रुक गईं। बौखलाए हुए लोग गाड़ियों से निकल पड़े और राह चलते भी रुक गए. . . भीड़ हो गई।

“अरे किसका बच्चा है यह?”

“देखो ज़्यादा चोट तो नहीं लगी?”

“भाई साहब आपने बहुत बचा दिया इसको।”

“बेहोश है यह तो!”

“कोई है क्या इसके साथ?”

“चलो चलो अस्पताल ले चलो।”

“कौन झमेले में पड़ेगा?”

“ले चलो भाई आजकल इलाज का पैसा सरकार दे रही है।”

“घायल को अस्पताल पहुँचाने वाले पर कोई कार्रवाई भी नहीं की जाएगी।”

“कौन छोड़ देता है इतने छोटे बच्चों को अकेला!”

“वह सब छोड़ो अभी इसको अस्पताल ले चलो।”

“शायद कहीं गुम चोट आई हो होश में तो नहीं है अभी भी।”. . .

सड़क पार करने को  एक किनारे खड़े बुज़ुर्ग ने अपनी आँखों से देखा था की तेज़ गति से चलते ट्रैफ़िक के बीच से वह दो डरे हुए बच्चों को हाथ पकड़ कर लगभग घसीट रही थी। बड़ा वाला तो वाहनों से डरकर सड़क पार ही नहीं करना चाहता था, वह ज़बरदस्ती खींच लाई थी। फिर उसने बीचों-बीच उसका हाथ छोड़ दिया और दौड़कर किनारे हो गई।

बच्चे के गिरने, गाड़ियों के रुकने और कोलाहल के बीच वह धीरे से  फ़्लाईओवर के खंभे की ओट में हो गई थी. . .

सारा ट्रैफ़िक थमा हुआ था। बुज़ुर्ग सड़क पार करके खंभे के पीछे खड़ी महिला के पास पहुँचे तो उन्हें देख वह जाने लगी।

उन्होंने हाथ पकड़ कर रोक लिया और कड़कते हुए बोले,  “क्यों किया ऐसा? लड़का मर जाता तो?”

कातर स्वर में वह बोली - "बाबू साहेब छह महीने पहले ठेकेदार गाँव से लाया था। अगले मोड़ पर जो बिल्डिंग बन रही है उसमें मैं और इसका बाप दिहाड़ी पर मजदूरी करते थे।  रोटी की गुजर हो रही थी। पिछले पंद्रह दिन से बिल्डिंग का काम रोक दिया गया, इस जुगत में कि लोगों को साफ हवा मिले. . . हवा साफ हुई कि ना, सो तो मैं ना जानूँ लेकिन हमारी तो रोटी रुक गई। दो दिन से भूखा था बच्चा। उसकी भूख और न देखी गई। वहाँ बीच में इसलिए छोड़ दिया कि जिंदा अस्पताल पहुँच गया तो जब तक इलाज चलेगा, रोटी मिलेगी और जिंदा ना बचा तो रोटी से हमेशा को मुक्ति मिलेगी. . . गरीब की यही जुगत बाबू!"

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