शिक्षा या विद्या पुनर्विचार की आवश्यकता: पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विशेष संदर्भ में

01-03-2026

शिक्षा या विद्या पुनर्विचार की आवश्यकता: पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विशेष संदर्भ में

डॉ. हर्षा त्रिवेदी (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

डॉ. हर्षा त्रिवेदी अध्येता, 
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान
राष्ट्रपति निवास, शिमला

भारतीय ज्ञान परंपरा के सुदीर्घ इतिहास में ‘शिक्षा’ और ‘विद्या’ दो ऐसे शब्द रहे हैं, जिन्हें अक्सर पर्यायवाची मान लिया जाता है, किन्तु इनके सूक्ष्म अर्थों में जीवन और जगत का संपूर्ण दर्शन समाहित है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ सूचनाओं का अंबार है और तकनीक का चरमोत्कर्ष है, वहाँ मानवीय मूल्यों का निरंतर क्षरण एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। इसी पृष्ठभूमि में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का दर्शन एक प्रकाश-स्तंभ की भाँति उभरता है, जो शिक्षा और विद्या के मध्य के मूलभूत अंतर को स्पष्ट करते हुए इनके पुनर्विचार की अनिवार्य आवश्यकता पर बल देता है। आचार्य जी का मानना था कि आधुनिक युग में हमने ‘शिक्षा’ (Information and Skill) का प्रसार तो बहुत किया, किन्तु ‘विद्या’ (Wisdom and Character) को विस्मृत कर दिया। शिक्षा वह है जो मस्तिष्क को प्रशिक्षित करती है और जीविकोपार्जन के योग्य बनाती है, जबकि विद्या वह है जो अंतःकरण को परिष्कृत करती है और मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है। उनके अनुसार, वर्तमान संकट का मूल कारण ‘साक्षरता’ का बढ़ना और ‘संस्कारिता’ का घटना है। शिक्षा यदि केवल पेट भरने का साधन बनकर रह जाए, तो वह मनुष्य को एक चतुर पशु में बदल देती है, जो अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग स्वार्थ सिद्धि और विनाश के लिए करता है। अतः, शिक्षा के आध्यात्मिक स्वरूप पर पुनर्विचार करना आज के समय की सबसे बड़ी माँग है।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने भारतीय उपनिषदों के उस सूत्र ‘सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात्‌ विद्या वही है जो बंधनों से मुक्ति दिलाए, को आधुनिक संदर्भों में व्याख्यायित किया। उनका तर्क था कि मुक्ति केवल मृत्यु के पश्चात की स्थिति नहीं है, बल्कि मानसिक दासता, अंधविश्वास, संकीर्णता और कुविचारों से मुक्ति ही वास्तविक विद्या का फल है। उन्होंने अनुभव किया कि लॉर्ड मैकाले द्वारा स्थापित भारतीय शिक्षा पद्धति ने क्लर्क तो पैदा किए, लेकिन ‘ऋषि’ और ‘मनीषी’ पैदा करने की क्षमता खो दी। इस शिक्षा ने व्यक्ति को अपनी जड़ों से काटकर पाश्चात्य भौतिकवाद का पिछलग्गू बना दिया। आचार्य जी ने ‘युग निर्माण योजना’ के माध्यम से जिस शिक्षा दर्शन का प्रतिपादन किया, उसमें ‘श्रम, संयम, सादगी और सज्जनता’ के चार स्तंभ अनिवार्य थे। उनका कहना था कि जब तक विद्यार्थी के चरित्र में इन गुणों का समावेश नहीं होता, तब तक उसकी डिग्री केवल एक काग़ज़ का टुकड़ा है। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन की भाँति ही शांतिकुंज और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के माध्यम से एक ऐसे शैक्षिक ढाँचे की परिकल्पना की, जहाँ आधुनिक विज्ञान और प्राचीन अध्यात्म का समन्वय हो। उनके अनुसार, विज्ञान के पास ‘शक्ति’ है और अध्यात्म के पास ‘दिशा'; यदि शक्ति को सही दिशा न मिले तो वह भस्मासुर बन जाती है। इसलिए, शिक्षा में ‘बोध'और ‘भाव’ का संतुलन होना चाहिए।

आचार्य जी ने ‘शिक्षा’ को मस्तिष्क का व्यायाम और ‘विद्या’ को हृदय का परिष्कार माना। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूचनात्मक ज्ञान (Literacy) व्यक्ति को अहंकारी बना सकता है, जबकि विमल विद्या (Wisdom) उसे विनम्र बनाती है। उन्होंने शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिए ‘ज्ञान रथों’ और ‘लोक शिक्षण’ की पद्धति अपनाई, क्योंकि उनका मानना था कि वास्तविक शिक्षा केवल विद्यालयों की चारदीवारी में नहीं, बल्कि समाज के हर घर तक पहुँचनी चाहिए। उन्होंने नारी शिक्षा पर विशेष बल दिया, क्योंकि उनके अनुसार एक शिक्षित पुरुष केवल एक व्यक्ति को शिक्षित करता है, जबकि एक शिक्षित नारी पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करती है। उनके दर्शन में ‘संस्कार’ शिक्षा का अनिवार्य अंग हैं। उन्होंने ‘षोडश संस्कारों’ को केवल कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक शिक्षण की पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। वे कहते थे कि मनुष्य के भीतर अनंत संभावनाएँ बीज रूप में विद्यमान हैं, शिक्षा का कार्य उन बीजों को अनुकूल वातावरण प्रदान कर अंकुरित करना है। आज की शिक्षा पद्धति में जो प्रतिस्पर्धा और तनाव है, आचार्य जी ने उसके विकल्प के रूप में ‘सहयोग’ और ‘सेवा’ आधारित शिक्षण का विचार दिया।

पुनर्विचार की आवश्यकता इस संदर्भ में भी है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ‘आर्थिक मानव’ का निर्माण करना रह गया है। आचार्य जी ने ‘अर्थ’ को जीवन का साधन माना, साध्य नहीं। उन्होंने चेताया था कि यदि शिक्षा मनुष्य को संवेदनशील नहीं बनाती, यदि वह उसे दुखियों के प्रति करुणा और राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य का बोध नहीं कराती, तो वह शिक्षा समाज के लिए बोझ बन जाएगी। उनके साहित्य में ‘जीवन जीने की कला’ पर अत्यधिक बल दिया गया है, जो वास्तव में विद्या का ही व्यवहारिक पक्ष है। इसमें आहार-विहार से लेकर विचार-व्यवहार तक के संयम का पाठ पढ़ाया गया है। उन्होंने मंत्र विज्ञान और यज्ञ विज्ञान को शिक्षा के साथ जोड़ने का प्रयास किया ताकि विद्यार्थी की एकाग्रता और संकल्प शक्ति का विकास हो सके। उनके अनुसार, ‘साधना’ ही वह प्रक्रिया है जो शिक्षा को विद्या में रूपांतरित करती है। बिना आत्म-मंथन के प्राप्त किया गया ज्ञान केवल बौद्धिक विलास है। उन्होंने स्वावलंबन को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा माना, ताकि युवा केवल सरकारी नौकरियों के भरोसे न रहकर अपनी प्रतिभा से समाज का सृजन कर सकें।

वर्तमान के कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति के युग में आचार्य जी का दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है। जब मशीनें मनुष्य से अधिक सूचनाएँ संचित कर सकती हैं, तब मनुष्य की विशिष्टता केवल उसकी ‘चेतना’ और ‘नैतिकता’ में ही शेष रहती है। विद्या इसी चेतना को जाग्रत करने का कार्य करती है। आचार्य जी का ‘विचार क्रांति अभियान’ वास्तव में शिक्षा के शुद्धिकरण का ही अभियान है। वे चाहते थे कि हर व्यक्ति ‘आत्म-चिन्तन’ करे और अपनी त्रुटियों को सुधारने का साहस दिखाए। उनका मंत्र था “मनुष्य के विचारों को बदल दो, संसार बदल जाएगा।” यह शिक्षा जगत के लिए सबसे बड़ी चुनौती और समाधान दोनों है। अंततः, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के विशेष संदर्भ में शिक्षा पर पुनर्विचार का अर्थ है। पाठ्यक्रम में मानवता का समावेश, शोध में नैतिकता का आग्रह और शिक्षण में गुरु-शिष्य परंपरा की जीवंतता। उनकी दृष्टि में भविष्य का विश्व एक ‘वसुधैव कुटुंबकम’ होगा, जहाँ शिक्षा केवल स्वार्थ सिद्धि का माध्यम न होकर विश्व शान्ति और एकात्मता का आधार बनेगी। यह आलेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि यदि हम आधुनिक पीढ़ी को विनाश से बचाना चाहते हैं, तो हमें ‘शिक्षा’ के सूचनात्मक ढाँचे को ‘विद्या’ के संस्कारात्मक प्राणों से पुनः सींचना होगा। यही पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक पुनर्जागरण होगा।

संदर्भ सूची

  • आचार्य, श्रीराम शर्मा। शिक्षा ही नहीं, विद्या भी (वाङ्मय क्रमांक ३८)। युग निर्माण योजना, मथुरा, २००१
  • युग निर्माण कैसे होगा? युग निर्माण योजना, मथुरा, २०१०
  • जीवन जीने की कला (वाङ्मय क्रमांक ६४)। युग निर्माण योजना, मथुरा, २००५
  • हमारी भावी शिक्षा पद्धति। युग निर्माण योजना, मथुरा, १९९८
  • जोशी, विकास। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का समाज दर्शन। विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, २०१८
  • सिंह, राजबली। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक चिंतन। हिंदी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, २०२१
  • “Pandit Shriram Sharma Acharya's Philosophy on Education” All World Gayatri Pariwar, 2026, www.awgp.org वेब। 

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