क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म
खान मनजीत भावड़िया 'मजीद’
जानते हो
मेरा जुर्म क्या था . . .?
मेरी ख़ामोशियों में,
मेरी मुस्कुराहटों में, मेरी तन्हाइयों में,
मेरी जागी हुई रातों में,
मेरी अधूरी बातों में
वह हर बार तुम्हें ढूँढ़ लिया करता था . . .
मेरी हर दुआ में तुम्हारा नाम था,
मेरी हर ख़ामोश नज़र में तुम्हारी ही तस्वीर बसती थी।
मैं भीड़ में खड़ा होकर भी
तुम्हारी यादों के साथ अकेला हो जाया करता था . . .
तुम्हारी मोहब्बत ने
मुझे गुनहगार बना दिया था . . .
गुनाह बस इतना था
कि मैंने तुम्हें दिल से चाहा,
तुम्हें अपनी दुनिया समझ लिया,
और तुम्हारी यादों को
अपनी साँसों में बसा लिया . . .
पर अब सोचता हूँ
पुरानी बातों को कुरेदने से
क्या हासिल होगा . . .?
राख को जितना भी कुरेदो,
हाथ बस काले ही होते हैं,
और दब चुकी चिंगारियाँ
फिर से हवा पाकर जलने लगती हैं . . .
इसलिए अब उन राख बने लम्हों को
वैसे ही पड़ा रहने देना बेहतर है।
जो कभी आग था,
जो कभी धड़कनों की आवाज़ था,
जो कभी मेरी दुनिया हुआ करता था—
वह अब सिर्फ़ एक कहानी बन चुका है . . .
एक ऐसी कहानी
जिसे अब दोबारा जीना नहीं,
बस चुपचाप यादों की किताब में
बंद करके रख देना है . . .
अब उसे साँसों में नहीं,
ख़ामोशी में रहने दो।
अब उसे पुकारना नहीं,
बस दूर से महसूस होने दो . . .
क्योंकि कुछ रिश्ते
नफ़रत से नहीं टूटते,
वे बस वक़्त की थकान से
ख़ामोशी में बदल जाते हैं . . .
और सच कहूँ
तो कभी-कभी छोड़ देना ही
सबसे सच्ची, सबसे गहरी
और सबसे मुश्किल मोहब्बत होती है . . .