कभी न भूलने वाला एहसास

01-02-2026

कभी न भूलने वाला एहसास

खान मनजीत भावड़िया 'मजीद’ (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


(दया और सादगी) 
 
ज़िंदगी की राहगुज़र पर बिखरे हैं
तजुर्बों के साये, यादों के नक़्श, 
कुछ लम्हे वक़्त के साथ मिट जाते हैं, 
कुछ रूह पर लिख देते हैं अपना हरफ़। 
 
दया और सादगी ऐसे ही जज़्बात हैं, 
जो ख़ामोशी से दिल में उतर जाते हैं। 
 
न कोई सवाल, न कोई तक़ाज़ा, 
दया बस निगाहों से पढ़ लेती है दर्द, 
किसी अजनबी का थामा हुआ हाथ
बन जाता है तन्हाई में रौशन चराग़। 
 
न नाम की ख़्वाहिश, न एहसान का शोर, 
बस इंसान ने इंसान को पहचान लिया। 
 
जब हौसले थक कर बैठ जाते हैं, 
जब राहें भी बे-आवाज़ हो जाती हैं, 
तब दया का एक नर्म-सा लम्स
दिल को फिर से जीने की ताक़त देता है। 
 
वो लम्हा वक़्त की क़ैद से आज़ाद होकर
याद नहीं, रूह का हिस्सा बन जाता है। 
 
सादगी भी कुछ ऐसी ही सिफ़त है, 
न शोहरत की चाह, न चमक का जुनून, 
एक छोटी-सी झोंपड़ी, खुला आसमान, 
और दिल में बसा हुआ गहरा सुकून। 
 
न आरज़ूओं का बोझ, न ख़्वाबों की भीड़, 
जो है, उसी में मुकम्मल इत्मीनान। 
 
मिट्टी की ख़ुशबू, हवा की सरगोशी, 
हर शय में क़ुदरत की सादा अदा, 
कम में भी बहुत कुछ मिल जाना
यही तो है ज़िंदगी की अस्ल फ़िज़ा। 
 
जहाँ चाहतें थम जाती हैं ख़ुद-ब-ख़ुद, 
वहीं से शुरू होती है सुकून की दुआ। 
 
दया इंसानियत का चेहरा है, 
सादगी उसकी पाकीज़ा ज़बान, 
जब ये दोनों साथ चलें ज़िंदगी में
तो हर पल बन जाता है क़ाबिल-ए-याद। 
 
न वक़्त इन्हें मिटा सकता है, 
न फ़ासले इन्हें धुँधला कर पाते हैं। 
 
यही वो एहसास हैं
जो लफ़्ज़ों से आगे निकल जाते हैं, 
और तमाम उम्र दिल के किसी कोने में
कभी न भूलने वाला एहसास
बन कर ठहर जाते हैं। 

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