गाँव की औरतें

15-01-2026

गाँव की औरतें

खान मनजीत भावड़िया 'मजीद’ (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

गाँव की औरतें 
घड़ा सिर पर उठाए, 
हँसती हुई, 
घर की हँसी–ठिठोली को
रास्ते में बिखेरती हुई। 
अगर थोड़ा-सा भी पास होता
उनका कुआँ, 
तो पाने के लिए
इतना संघर्ष
क्यों करना पड़ता? 
नल पास है, 
पर होशपूर्वक नहीं। 
कितनी बार
कुआँ ख़ाली लौटाता है
उनकी मेहनत। 
पानी भरने में
कितना समय
यूँ ही बह जाता है—
सिर बस पानी ढोता रहता है, 
और दिमाग़
हमेशा किताबों से
दूर रह जाता है। 

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