गाँव की औरतें
खान मनजीत भावड़िया 'मजीद’
गाँव की औरतें
घड़ा सिर पर उठाए,
हँसती हुई,
घर की हँसी–ठिठोली को
रास्ते में बिखेरती हुई।
अगर थोड़ा-सा भी पास होता
उनका कुआँ,
तो पाने के लिए
इतना संघर्ष
क्यों करना पड़ता?
नल पास है,
पर होशपूर्वक नहीं।
कितनी बार
कुआँ ख़ाली लौटाता है
उनकी मेहनत।
पानी भरने में
कितना समय
यूँ ही बह जाता है—
सिर बस पानी ढोता रहता है,
और दिमाग़
हमेशा किताबों से
दूर रह जाता है।