माँ
तुम्हारा कोई मंदिर नहीं
हमारे मन के सिवा
माँ
तुम्हारी कोई पूजा नहीं
हमारे नमन के सिवा
माँ
तुम्हारे गुणगान का
कोई श्लोक, कोई प्रार्थना नहीं
फिर भी, माँ
तुम्हारा नाम
अपने इष्ट से ज़्यादा
हम लेते हैं
और
हर ख़ास-ओ-आम मौक़े पर
तेरे कहे जुमलों को
श्लोकों से ज़्यादा बार दुहराते हैं
माँ
तेरे जीवन के अनुभव ही
दर्शन ग्रंथों से ज़्यादा काम आते हैं।
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