तुमसे मिल कर ख़ुशी मिली है

15-11-2019

तुमसे मिल कर ख़ुशी मिली है

डॉ. महेश आलोक

मेरे मन की दीवारों पर 
इतना लिख दो केवल साथी
तुमसे मिल कर ख़ुशी मिली है

 

जिसे तलाशो वह मिल जाये 
ऐसा कहीं कभी होता है
तस्वीरों से बाहर आकर 
कोई कहीं कभी रोता है
पानी तो केवल पानी है 
ऊपर नीचे सभी तरफ़ से
फिर भी लहरों की तालों पर 
चन्दा गाये बड़े अदब से


मेरे डर की दीवारों पर 
इतना लिख दो केवल साथी
हरफ़ों में सूरज को लेकर 
आँखों के उस पार लरजना
यही कला है 
कौन दृश्य के पार चला है

 

हम तुम बस उस पल के साथी
नदी जहाँ लगभग उथली है

 

तुमसे मिल कर ख़ुशी मिली है 
इसका बोध ज़रा होने दो
तारों की आँखों में रुककर 
अपनी आँख ज़रा धोने दो
हैरतज़दा हवा को देखो 
उसके पैर वहीं ठहरे हैं
जहाँ हमारे पँख खुले हैं 
नहीं कहीं कोई पहरे हैं

 

मेरे घर की दीवारों पर 
इतना लिख दो केवल साथी
पानी वाले सम्बन्धों का 
जितना वज़न उठाया हमने
उसका कोई मोल नहीं है 
उसका कोई तोल नहीं है

 

हमें झूमकर जिस पर चलना
डोर वहाँ लगभग पतली है

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