पं. विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंधों में लोक संस्कृति

15-12-2019

पं. विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंधों में लोक संस्कृति

डॉ. पुनीता जैन

 परिवेश, वातावरण या परिस्थितियों के विश्लेषण के लिये जब हम पं. विद्यानिवास मिश्रजी के ललित निबंधों पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि उनके निबंधों में जिस वातावरण की सृष्टि हुई है वह दो दिशाओं में जाती है, एक - भारतीय संस्कृति, परम्परा व लोक तथा ग्रामीण संस्कृति से ओत-प्रोत जीवन्त, सरस, सहज जीवन का परिदृश्य, दूसरा - समसामयिक जीवन की विसंगतियों, आधुनिक तकनीकी, यांत्रिकता, भौतिकता की करुण नियति से उत्पन्न जीवन की नीरसता, शुष्कता, कृत्रिमता,  यंत्रबद्धता, खोखलेपन व नकलीपन की त्रासदी से युक्त शहरी जीवन का यथार्थ चित्र। इस प्रकार इनके निबंधों में एक तरफ़ यदि भारतीय संस्कृति तथा लोक संस्कृति का गौरव एवं वैभव छिटका है, तो दूसरी तरफ़ आधुनिकता की चकाचौंध व बनावटीपन से युक्त  रिक्तता से भरे शहरी जीवन का चित्र देखने को मिलता है। किन्तु ध्यातव्य है कि सर्वत्र भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा लोक संस्कृति की पृष्ठभूमि  तथा परिप्रेक्ष्य  में ही लेखक आधुनिक जीवन की विसंगतियों  को उभारता है या कहिए सांस्कृतिक संदर्भ में आधुनिक परिवेश मिश्रजी के निबंधों में उजागर हुआ है। वस्तुतः मिश्रजी के निबंधों में "कसक का कारण है जन-जीवन में धीरे-धीरे शहरी मनोवृत्ति का विकास। शहरी मनोवृत्ति सहज संस्कृति को संकुचित करती है। संस्कृति की इस संकुचन-प्रक्रिया में मनुष्य का भौतिक (बाह्य) जीवनसुख-सुविधा-समृद्ध अवश्य हो जाता है, किन्तु उससे आत्मिक (अन्तः) जीवन की सजीवता, सहजता, पारस्परिक सौहार्द, माधुर्य, सरसता, आनंद-स्फूर्ति, प्रकृति, सौन्दर्य, सावनी हरीतिमा, वासन्ती, उल्लास, फागुनी अल्हड़ता आदि सब ठिठुरते जाते हैं। अतः समृद्ध स्वस्थ, सहज जीवन के लिये लोक-भावना की संस्कृति या लोक-संस्कृति चाहिए। मिश्रजी इस लोक संस्कृति के ही संवादक है।"1 इसीलिये मिश्रजी के निबंधों का विश्लेषण करते समय हम पाते हैं कि वर्तमान आधुनिक  परिवेश तथा सामान्य दैनन्दिन जीवन की समस्याओं, घटनाओं, विसंगतियों को तीव्रता से दर्शाने के लिये वे भव्य अतीत की उच्च कोटि की श्रेष्ठ व मंगलमयी परंपरा, भारतीय संस्कृति की दिव्य कल्याणकारी दृष्टि तथा लोक संस्कृति व ग्रामीण जगत की जीवन्तता, सजीवता, सहजता व सरसता का स्मरण स्थान-स्थान पर करते चलते हैं। फलतः भारतीय संस्कृति का दृश्य, लोक जीवन का सहज चित्र, परम्परागत उत्सव, पर्व, रीति रिवाजों का चित्रण निबंधों में यत्र-तत्र सर्वत्र सहज ही प्राप्य है। "उनके निबंधों में यह लोक संस्कृति कई रूपों में अपनी सुबास छोड़ जाती है। टटके अछूते लोक गीतों के रूप में, व्रत उपवास, तीज-त्योहारों पर प्रचलित, लौकिक व्यवहारों और क्रिया-कलापों  की मधुर स्मृतियों के रूप में, शादी-ब्याह, मुंडन, जनेऊ आदि के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों के पीछे छिपी प्राचीन परम्परा की ठेठ देहाती धरोहर को सजाने-संवारने उनके रख-रखाव की चिन्ता की अभिव्यक्ति के रूप में, यह लोक संस्कृति उनके व्यक्तित्व का एक अविभाज्य अंग बनकर सामने आती है।"2 यद्यपि वे सर्वत्र लोक जीवन, संस्कृति के अंध पक्षों से बचकर चलते हैं।

मिश्रजी के निबंधों में पारिभाषिक, नवीन गढ़े हुए शब्द, देशज-लोक शब्दावली, ध्वन्यात्मक शब्दावली, विदेषी शब्दों का निर्बन्ध प्रयोग हिन्दी के शब्द भंडार में श्रीवृद्धि करता है। "इनकी भाषा  में  आपको भोजपुरी संस्कारिता, राप्ती की प्रखरधारा, हिमालय की तलहटी में रहने  वाले व्यक्तित्व के उत्तुंग शृंग और संस्कृत में पले एक खांटी ब्राह्मण की वदान्यता से पुष्ट वैदुष्य और सबके ऊपर एक आधुनिक  बुद्धिजीवी की अपने ही भीतर के देवता और दैत्य से निरन्तर युद्धरत रहने की सरगर्मी भी मिलेगी।"3  लोकगीतों की पंक्तियाँ मिश्रजी के निबंधों में विशेष रूप से देखने को मिलेगी। संस्कृत काव्यों के विभिन्न उद्धरण व दृष्टांत तथा अनेक आख्यान, प्रसंगों, मिथकों द्वारा मिश्रजी की उद्धरण प्रामाणिकता तथा संदर्भ गर्भिता का परिचय मिलता है।  पौराणिक मिथक, संदर्भ तथा कथाएँ मिश्रजी के निबंधों  को समृद्ध करते हैं तथा अभिव्यक्ति को गूढ़ भावव्यंजनापूर्ण बनाते हैं।  

उल्लेखनीय है कि मिश्रजी  के ललित निबंधों में समाज की राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक, भाषागत, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों  का खुला चित्रण हुआ है। यही नहीं आंचलिकता व शहरी  प्रभाव ग्रस्त ग्रामीण परिवेश के साथ-साथ प्रकृति-प्रेम व प्रकृति श्री का सौम्य दर्शन व उसके माध्यम से गूढ़ संदेश भी निबंधों में श्लाघनीय है। प्राचीन भव्य परम्परा व संस्कृति के साथ-साथ समसामयिक आधुनिक जीवन की अमिट छाप उनके निबंधों में मिलेगी। लेखक की बाद की रचनाओं में तो परिवेश का दर्द आधुनिकीकरण की विसंगतियाँ तीव्र रूप से उत्पन्न हुई हैं। युग के प्रत्येक उतार-चढ़ाव समस्याओं व घटनाओं  की संवेदना के साथ उनका निबंधकार जुड़ता है। उनका प्रत्येक निबंध संस्कृति का उदात्त पक्ष या आधुनिक परिवेश का दृश्य उसका दर्द सम्मुख लाता है। संस्कृति व समाज दोनों उनके व्यक्तित्व में एकाकार होकर निबंध में उभरे हैं।  इसीलिये ग्राम्यजीवन का सुकुमार वातावरण तथा शहरी परिवेश, परंपरा व आधुनिक जीवन, प्राचीन व नवीन परिवेश की सशक्त अभिव्यक्ति उनके निबंधों  में हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश, विश्व की स्थिति, युद्ध व शांति की स्थिति, विश्व मंगल में बाधक परिस्थितियों को भी निबंध में मुखर स्वर प्राप्त हुआ है। परिवेश की विसंगतियों के प्रति  एक आकुलभाव,  छटपटाहट और पीड़ा निबंध में सर्वत्र दर्शित है। इस प्रकार लेखक परिवेश के साथ अपने निबंधकार को जोड़कर उसमें डूबकर उसे अपने निबंधों में मुखरित करता है।  

संदर्भः-

  1. डॉ. हर्षनारायण ‘नीरव’- ललित निबंध (सं. डॉ. पुष्पपाल सिंह - हिन्दी साहित्यः आठवाँ दशक), पृ. 144-145
  2. डॉ. शिवप्रसाद सिंह भोर का आवाहन, पृ. 4
  3. डॉ. शिवप्रसाद सिंह भोर का आवाहन, पृ.10

पुनीता जैन
प्राध्यापक -हिन्दी
शास. स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
भेल, भोपाल
मो.     94250-10223

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