मैं कविता में मनुष्य बना रहा हूँ

01-10-2019

मैं कविता में मनुष्य बना रहा हूँ

डॉ. महेश आलोक

मैं कविता में मनुष्य बना रहा हूँ

 

सबसे पहले मैंने एक दिल बनाया और उसे इतना साफ़ किया कि
आइने की तरह देख सकूँ उसमें अपने चेहरे की झुर्रियाँ
और मूँछों के बीच फँसा वह सफ़ेद बाल जिसे मैं
छिपाता आया हूँ आज तक

 

चेहरा बनाते समय मुझे कई नामचीन लोग याद आए
मैंने किसी से मुस्कुराहट ली
किसी की त्वचा झाड़-पोंछ कर साफ़ किया
आँखें ऐसी लीं जैसे किसी बड़े कवि की होती हैं
क्योंकि वह अपनी आँखों की रोशनी से
चन्द्रमा की आँखों में फँसा तिनका भी देख सकता है

 

पलकें बनाते समय मुझे इस बात का ध्यान रखना है कि
प्रतीक्षा के समय उस पर दिया रखने पर लौ की टिमटिमाहट
अक्षुण्ण बनी रहे

 

माँस मज्जा हड्डियाँ खून हाथ पैर सब कुछ बनाने के बाद
एक चीज़ जो अभी रह गयी है डालने से और मेरी दृष्टि में
उसका महत्व अधिक है
वह है दिमाग़
मेरे सामने दुनिया के सारे शक्तिशाली दिमाग़ हवा में तैर रहे हैं
मैं सबका मिश्रण तैयार करना चाहता हूँ

 

मैं चाहता हूँ दिल से उसका रिश्ता क़ायम रहे
और यही बात उस दिमाग़ को बनाने में आड़े आ रही है
मै कालीदास के दिमाग़ में कबीर और तुलसी को रख रहा हूँ
वह सब कुछ कर रहा हूँ जो एक बेहतर मनुष्य बनाने में
हमारी मदद कर सके

 

मैं हार नहीं रहा हूँ। उसके तमाम कल-पुर्जे कस रहा हूँ

 

कुछ है जो छूट रहा है
कुछ है जो बार बार फिसल रहा है
और कविता उसे लेकर  मुझसे ज़्यादा परेशान
मुझसे ज़्यादा बेचैन दिख रही है

 

मैं कविता में मनुष्य बना रहा हूँ

 

शब्दों की साँसों में हवा के तबले की थाप दे रहा हूँ
सपनों के कन्धों पर बादलों के पर लगा रहा हूँ
ख़ून में रख रहा हूँ सूरज की आत्मा की ख़ुशबू
तितली के रंगों और इन्द्रधनुष की चमक से भर रहा हूँ
कोना कोना। रख रहा हूँ हरी दूब और उसकी नोक पर टिकी
बूँद में ख़ुशी से फूलता आकाश

 

मैं हार नहीं रहा हूँ कैसे हार सकता हूँ मैं

 

चाहे कुछ भी हो तानाशाह को हारना ही होगा
उस मनुष्य के सामने जो कविता में
कविता से बड़ा हो रहा है

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