उस पार की आकांक्षा
दीपकयाद है मुझे तुम रहती हो उस पार
फिर भी आती तुम्हारी यहाँ तक झंकार
क्यों नहीं यह जान पाया तुम्हें ये कुमार
मैंने देखा है तुम्हारे अंदर बड़ा-सा संसार
क्यों तुम्हें नहीं है यह सब ज्ञात
हम हमेशा रहते हैं तुम्हारी स्मृतियों के पास
इन्हीं सभी बातों के लिए तुम्हें रखते हैं अज्ञात
यही तुम्हें बता दूँ तुम्हारे अंदर बसता है
मेरा भी छोटा-सा प्राण।
1 टिप्पणियाँ
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बहुत सुंदर रचना..