स्त्रियों के साहस और उनके जज़्बातों की बड़ी बेबाक कहानियाँ

15-12-2023

स्त्रियों के साहस और उनके जज़्बातों की बड़ी बेबाक कहानियाँ

दीपक गिरकर (अंक: 243, दिसंबर द्वितीय, 2023 में प्रकाशित)

पुस्तक: मैं चुप नहीं रहूंगी (कहानी संग्रह)
लेखक: संजीव जायसवाल ‘संजय’
प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, 41, हसनपुर, आई पी एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
आईएसबीएन: 978-81-19206-20-9
मूल्य: 220 रुपए

‘चुप नहीं रहूंगी’ सुपरिचित कथाकार संजीव जायसवाल ‘संजय’ का चर्चित कहानी संग्रह है। इनकी रचनाएँ हँस, पाखी, प्रगतिशील वसुधा, साहित्य अमृत, लहक, क़िस्सा, निकट, पुष्पगंधा, उद्भावना, ककसाड, बया, चौराहा, दैनिक जनसत्ता इत्यादि प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। संवेदनशील व उम्दा कथाकार संजीव जायसवाल ‘संजय’ पुरुषों की वासनाओं, उनके उन्माद, उनकी विकृत मानसिकता को, स्त्रियों के साहस और उनके जज़्बातों को बड़ी बेबाकी से अपनी कहानियों में अभिव्यक्त करते हैं। लेखक ने अपनी कहानियों में स्त्रियों के शोषण को बहुत प्रभावी रूप से उजागर किया है। लेखक ने इस संग्रह की कहानियों में भावनाओं के अनियंत्रित प्रवाह को बयाँ किया है। संजीव जायसवाल अपनी कहानियों में अपने पात्रों को पूरी आज़ादी देते हैं। मैं चुप नहीं रहूंगी पुस्तक नए तेवर की 13 कहानियों का पुलिंदा है, जिसमें स्त्रियों की मनःस्थितियों के कई शेड्स उभर कर आते हैं। नवीनता और ताज़गी से भरी ये रोचक कहानियाँ पाठक को बाँधे रखती हैं। नारी उन्मूलन के ज्वलंत मुद्दों को उठाती हुई ये कहानियाँ नारी मन का मनोवैज्ञानिक तरीक़े से विश्लेषण करती हैं। इस कहानी संग्रह की कहानियों में यथार्थवादी जीवन, पारिवारिक रिश्तों के बीच का ताना-बाना, दोगलापन, संवादहीनता, विवाहपूर्व दैहिक सम्बन्ध, बेबसी, शोषण, उत्पीड़न, आर्थिक अभाव, पुरुष मानसिकता, सामंती व्यवस्था के अवशेष, पुरुषों के उद्दंड आचरण, स्त्री जीवन का कटु यथार्थ, स्त्री संघर्ष और स्त्रीमन की पीड़ा आदि का चित्रण मिलता है।

संग्रह की पहली रचना ‘सहमत’ एक अलग कलेवर की बेहद खिलंदड़ अंदाज़ में लिखी गई कहानी है। कहानी का शीर्षक ‘सहमत’ कथानक के अनुरूप है। ‘सहमत’ कहानी का कैनवस बेहतरीन है। कथाकार ने युवती अनामिका के यौन सम्बन्धों की खुली मानसिकता को बहुत सावधानी से रेखांकित किया है। नारी संवेदना को अत्यन्त आत्मीयता एवं कलात्मक ढंग से चित्रित करती रोचक कहानी है जो पाठकों को काफ़ी प्रभावित करती है। ‘सोने का पिंजरा’ कहानी एक बिलकुल अलग कथ्य और मिज़ाज की कहानी है जो पाठकों को काफ़ी प्रभावित करती है। दीपा और रोहित दोनों मित्र थे और थीसिस पूरी करने के बाद शादी करना चाहते थें। दीपा दिन-रात मेहनत कर के अपनी थीसिस पूरी कर लेती है और वह अपनी थीसिस रोहित को पढ़ने के लिए देती है, लेकिन रोहित थीसिस लेकर ग़ायब हो जाता है और कुछ समय पश्चात वही थीसिस अपने नाम से एक अमेरिकन साइंस जर्नल में प्रकाशित करवा लेता है। दीपा को बहुत बड़ा धक्का लगता है, लेकिन वह हिम्मत नहीं हारती है और फिर से रिसर्च पेपर तैयार कर के अपनी पीएच.डी. पूरी कर लेती है। फिर दीपा अपने पिताजी की फार्माक्यूटिक्लस कंपनी में काम करती है और फिर वह इसी कंपनी की सीईओ बन जाती है। रोहित अधिक पैकेज के लिए दीपा की कंपनी ज्वाइन करता है। वह दीपा की कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बन जाता है। लेकिन दीपा न तो उससे कभी मिलती है और उसे कंपनी में कोई काम नहीं देती है। कुछ महीनों के पश्चात रोहित ज़बरदस्ती दीपा के केबिन में जाकर दीपा को देखकर भौचक्का रह जाता है। वह दीपा से काम माँगता है लेकिन दीपा उसे कोई काम नहीं देती है और रोहित को हर महीने तनखा बराबर मिलती है। दीपा रोहित को मानसिक सज़ा देती है। दीपा रोहित को विश्वासघात का अच्छा सबक़ देती है। रोहित को दीपा की कंपनी में ऐसा लगता है कि वह एक सोने के पिंजरे में बंद है।

‘विसर्जन’ नोटबंदी विषय को लेकर आईएएस अधिकारियों पर व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई कहानी है। अचानक हुई नोटबंदी से एक ही रात में सभी भ्रष्टाचारियों के होश उड़ गये। सारे भ्रष्टाचारी अधिकारी काला धन ठिकाने लगाने की चिंता में दिन-रात एक कर देते हैं। अंत में मिस्टर और मिसेज खन्ना एक हज़ार और पाँच सौ के नोट बोरों में भरकर नदी में विसर्जित करते हैं तो वे दोनों भी नदी में विसर्जित हो जाते हैं। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘मैं चुप नहीं रहूंगी’ एक अलग तेवर के साथ लिखी गई है। यह कहानी इस संग्रह की महत्त्वपूर्ण कहानी है। कहानीकार ने कहानी के प्रारम्भ में मोनिका की विवशता को दिखाकर स्त्री जीवन की नियति को दिखाया है। एक प्रभावशाली मंत्री दीनानाथ चौधरी का इकलौता बेटा अमन अपने साथ कॉलेज में पढ़ने वाली मोनिका का बलात्कार करता है और उसकी विडिओ क्लिपिंग बना लेता है। मोनिका घर पर आकर अपनी माँ और पिताजी को घटना की जानकारी देकर कहती है “मैं चुप नहीं बैठूँगी।” पुलिस थाने में थानेदार अमन के विरुद्ध एफ़आईआर नहीं लिखता है। बड़े पुलिस अधिकारी भी उलटे मोनिका को ही समझाते हैं। समाचार पत्रों के संपादक भी बलात्कार का समाचार प्रकाशित करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। रात में मंत्री दीनानाथ का फोन मोनिका के पास आता है कि बेटी तुम बीस लाख रुपए ले लो और चुप बैठ जाओ। मोनिका इस फोन को टेप कर लेती है। फिर मोनिका फ़ेसबुक पर अपने साथ हुए बलात्कार के समाचार के साथ बलात्कार की विडिओ क्लिपिंग और और मंत्रीजी की ऑडियो क्लिपिंग अपलोड कर देती है। फ़ेसबुक की यह पोस्ट वायरल हो जाती है और फिर सारे महिला संगठन की महिलाएँ और पास के शहरों की महिलाएँ मंत्रीजी का बँगला घेर लेती है और मंत्री और उसके बेटे के विरुद्ध नारेबाज़ी शुरू कर देती है। सरकार एक्शन लेती है और मंत्री से मंत्री पद छीन लेती है और पुलिस अमन को गिरफ़्तार कर के जेल में डाल देती है। कहानीकार ने मोनिका की पीड़ा, उसका अंतर्द्वंद्व और उसकी विवशता को रेखांकित किया है।

‘काश तुम न मिले होते’ उदात्त प्रेम की मर्मस्पर्शी कहानी है। लन्दन में रहते हुए नेहा और जावेद में प्रेम हो जाता है, लेकिन दोनों के पेरेंट्स इस शादी के लिए तैयार नहीं होते हैं। नेहा के पिताजी नेहा को भारत भेज देते हैं। नेहा आर्म्ड फ़ोर्स मेडिकल कॉलेज पूना की प्रवेश परीक्षा देती है और उसका चयन मेडिकल में हो जाता है और पाँच वर्ष की पढ़ाई के पश्चात उसकी नियुक्ति भारतीय सेना के मेडिकल कोर में हो जाती है। नेहा की पोस्टिंग कश्मीर में हो जाती है। दूसरी ओर जावेद एक आतंकवादी बन जाता है। कहानी के अंत में जावेद रिवाल्वर से स्वयं के सीने में गोलियाँ उतार देता है और नेहा से कहता है कि “मोहब्बत में क़ुर्बानी देने का हक़ सिर्फ़ हिन्दुस्तानियों को ही नहीं है, हमारे यहाँ भी क़ुर्बानी देने का रिवाज़ है।” नेहा भावना में न बहकर अपने कर्त्तव्य को प्राथमिकता देती है। ‘रियल रिलेशनशिप’ कहानी में मुंबई महानगर में नौकरी करने वाले रागनी और नितिन पहले लिव इन में रहते है। मुंबई महानगर में रागनी और नितिन दोनों की आय कम है और ख़र्च अधिक है, इसलिए दोनों एक ही फ़्लैट में लिव इन में रहते हैं और ख़र्च आधा आधा बाँट लेते हैं। अंत में दोनों शादी के लिए तैयार हो जाते हैं।

‘एक और दधीचि’ एक लाजवाब कहानी है। लड़की सुंदर हो और उसमें प्रतिभा भी हो तो यही सुंदरता और प्रतिभा उस लड़की के लिए अभिशाप बन जाती है। भावना में ये दोनों ख़ूबियाँ थी। भावना कॉलेज से संगीत में एमए कर रही थी। कॉलेज के संस्थापक ठाकुर भीम देव सिंह को भावना पसंद आ गई थी। ठाकुर भावना को अपने एक स्कूल में म्यूज़िक टीचर के पद पर नियुक्त कर देता है। भावना ठाकुर के चंगुल में नहीं आती है तो ठाकुर भावना के पिताजी को ग़बन के आरोप में निलंबित करवाकर उनके ख़िलाफ़ पुलिस में एफ़आईआर लिखवा देता है। पुलिस भावना के पिताजी को गिरफ़्तार करने आ जाती है। भावना पुलिस से एक दिन की मोहलत माँगती है और फिर भावना दधीचि की तरह अपनी देह को ठाकुर को सौंप देती है। भावना के पिताजी का निलंबन कैंसिल हो जाता है। भावना को रहने के लिए स्कूल परिसर में ही एक फ़्लैट मिल जाता है। जब ठाकुर की इच्छा होती है तब भावना अपना शरीर ठाकुर को सौंप देती है। एक दिन ठाकुर का बेटा रतन भावना को देखता है तो वह भावना के साथ बलात्कार की कोशिश करता है। कहानी के अंत में कथाकार लिखते हैं—अंत में भीमा ठाकुर आँखें फाड़े लुंज पुंज खड़ा अपने बेटे रतन को देख रहा था। भावना का नग्न शरीर अग्नि से भी पवित्र और गंगा सा निर्मल नज़र आ रहा था। भावना के चेहरे पर अभूतपूर्व शान्ति छायी हुई थी। वैसी ही शान्ति जैसी वज्र प्रहार से हताहत दानवों को देख दधीचि की आत्मा के चेहरे पर छायी होगी। कहानी बाप-बेटे की कुटिल मानसिकता को नग्न करती है।

इस कहानी का एक अंश:

“भावना पीछे पलटी और अपनी नग्नता को दोनों हाथों से छुपाने का असफल प्रयास करते हुए गिड़गिड़ा उठी, “मैं आपकी माँ के समान हूँ। भगवान के वास्ते मुझे छोड़ दीजिए . . .”

“वाह, क्या डायलाग मारा है? आज तक तो लड़कियों को यही कहते सुना था कि मुझे छोड़ दीजिए मैं आपकी बहन के समान हूँ . . . बेटी के समान हूँ। लेकिन आपने तो स्त्री-पुरूष के सम्बन्धों को एक नयी परिभाषा प्रदान की है, आपकी गोद में खेलने में मज़ा आ जायेगा,” रतन ने बाँहें बढ़ा भावना को फ़र्श से उठा लिया।

“मैं सच कह रही हूँ। आप मेरे बेटे समान है। इस रिश्ते को कलंकित मत करिये,” भावना हाथ जोड़ फफक पड़ी। ज़बरदस्ती ही सही लेकिन भीमा ठाकुर ने उसके साथ सम्बन्ध स्थापित किए थे। भावना के संस्कार इस रिश्ते को और अधिक कलंकित करने की अनुमति नहीं दे रहे थे।

“चुप कर हरामज़ादी . . . उतनी देर से उल्टा सीधा बके जा रही है। अब अगर एक लफ़्ज़ भी मुँह से निकाला तो गला घोट दूँगा,” भरपूर तमाचा जड़ते हुए रतन दहाड़ उठा।

झन्न . . . पाँचों उँगलियों की छाप भावना के गाल पर उभर आयी। वह उसे सहला भी नहीं पायी थी कि रतन ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और उसके ऊपर सवार होने लगा। तभी रंग में भंग हुआ। बिस्तर पर पड़े भावना के मोबाइल की घंटी बज उठी।

“किस हरामज़ादे, का फोन है?” क्रोध से उफनते हुए रतन ने मोबाइल को फेंकने के लिये उठाया किन्तु स्क्रीन पर दृष्टि पड़ते ही बुरी तरह चौंक पड़ा। भीमा ठाकुर कालिंग . . . केवल तीन शब्द उसके बल को ढीला करने के लिये काफ़ी थे। वह भावना के चेहरे की ओर देख अविश्वसनीय स्वर में फुसफुसाया, “डैडी का फोन तुम्हारे मोबाइल पर कैसे?”

भावना ने बिना कुछ कहे उसके हाथ से मोबाइल लेकर उसका स्पीकर ऑन कर दिया।

“हैलो, जानेमन, नीचे आ जाओ। मैं गाड़ी में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ,” स्पीकर से भीमा ठाकुर की आवाज़ गूँजी।

“मैं नीचे नहीं आ सकती,” भावना ने हाँफते हुए कहा। जाने क्यूँ इसके अलावा उसे और कुछ सूझा ही नहीं।

“ठीक है, मैं ही हुज़ूर की ख़िदमत में आ जाता हूँ,” भीमा ठाकुर ने कहा और फोन काट दिया।

रतन के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। माँ . . . बेटे . . . और बाप . . . के रिश्ते का त्रिकोण उसकी समझ में आ गया था। भीमा ठाकुर का सामना करने की उसमें हिम्मत नहीं थी। उसने बिस्तर पर पड़ी चादर उठा कर भावना के ऊपर डाल दी और हाथ जोड़ते हुए बोला, “मैं जा रहा हूँ। आप डैडी से इस बारे में कुछ मत कहियेगा। इसके बदले में आप जो क़ीमत कहेंगी मैं चुकाने के लिये तैयार हूँ।”

“मुँह माँगी क़ीमत चुकाओगे?” अपने नग्न शरीर को चादर से लपेटते हुए भावना उठ खड़ी हुई।

“आप जो भी कहेंगी मुझे क़ुबूल है,” रतन ने राहत की साँस ली।

“तो फिर यहीं रुको और एक मर्द की तरह हालात का सामना करो,” भावना की आँखों से अंगारे बरस उठे।

उसके चेहरे पर छाये भावों को देख रतन ने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी। वह तेज़ी से दरवाज़े की ओर लपका लेकिन भावना उसकी क़मीज़ का कॉलर थाम गरज उठी, “मेरे जीते जी तुम यहाँ से नहीं भाग सकते।”

क़मीज़ के बटन पहले से ही खुले थे। एक झटके में वह भावना के हाथ में आ गयी।

“यह आप क्या कर रही हैं? डैडी ने अगर मुझे यहाँ देख लिया तो ग़ज़ब हो जायेगा,” रतन बुरी तरह घबरा उठा।

“कोई ग़ज़ब नहीं होगा, बल्कि एक बहादुर बाप का सीना बेटे की बहादुरी देख गर्व से चौड़ा हो जायेगा,” भावना के होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट तैर गयी। इसी के साथ उसने रतन के हाथों को पकड़ अपने गाल पर लगाया और उसके नाख़ूनों को पूरी शक्ति से गड़ाते हुए नीचे खींच दिया। उसके दोनों गालों से ख़ून छलछला आया। इससे पहले कि रमन इसका मतलब समझ पाता वह पूरी शक्ति से चिल्लाने लगी, “बचाओ . . . बचाओ . . . बचाओ . . .”

“यह आप क्या कर रही हैं?” रतन बुरी तरह बौखला उठा।

“बलात्कार,” भावना ने रतन की आँखों में घूरा।

“बलात्कार?”

“हाँ, बलात्कार,” भावना घायल नागिन की तरह फुंफकार उठी,” तुम मर्द समझते हो कि इज़्ज़त लूटने का अधिकार सिर्फ़ तुम मर्दों के पास है। यह भी नहीं सोचते कि जब किसी स्त्री की इज़्ज़त लुटती है तब सिर्फ़ उसका शरीर घायल नहीं होता बल्कि आत्मा भी लहुलुहान हो जाती है। एक नारी जो सृष्टि का सृजन कर सकती है वह ज़िन्दा लाश बन कर रह जाती है। तिल-तिल कर जीने के लिये अभिशप्त। तुम्हारी पिपासा उसकी आजन्म हताशा की पर्याय बन जाती है। उसके रोने-गिड़गिड़ाने का तुम लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है, लेकिन आज मैं तुम्हें बताऊँगी कि इज़्ज़त लुटने का दर्द क्या होता है। ज़िल्लत और ज़लालत का दंश क्या होता है।”

सड़ाक . . . सड़ाक . . . सड़ाक . . . रतन की नंगी पीठ पर कोड़े बरसने लगे। अचंभित, हतप्रभ, सन्निपात की अवस्था में वह जड़ सा हो गया। बोलते-बोलते भावना का स्वर भर्राने लगा था। अचानक उसने अपने आँसुओं को पोंछा और पूरी शक्ति से चिल्लाने लगी, “बचाओ . . . बचाओ . . . बचाओ . . .“

उसकी चीख सुन रतन को होश आया। वह तेज़ी से दरवाज़े की ओर भागा लेकिन भावना उससे लिपट गयी। चीखने के साथ-साथ वह अपने नाखुनों से रतन के चेहरे और उसके नंगे सीने को भी नोचे डाल रही थी। जाने कहाँ की दैवीय शक्ति समा गयी थी उसमें। रतन ने लाख कोशिश की लेकिन अपने को छुड़ा नहीं पा रहा था। उसकी समस्त पैशाचिकता, आदिशक्ति के समक्ष निशक्त और निरर्थक होकर रह गयी थी।

कोई और उपाय न देख वह भावना के पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाने लगा, “मुझसे ग़लती हो गयी। मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं वादा करता हूँ कि आज के बाद से मैं सभी लड़कियों को अपनी माँ-बहन के समान समझूँगा।”

“लेकिन तुम्हारे रिस्पेक्टेड डैडी तो ऐसा नहीं समझेंगें,” भावना दाँत भींचते हुए गुर्रायी और अपने दाँत रतन के कंधों पर गड़ा दिया।

रतन के मुँह से सिसकारी निकल गयी। भावना ने उसके चेहरे पर घृणा भरी दृष्टि डाली और एक बार फिर चिल्लाने लगी, “बचाओ . . . बचाओ . . . बचाओ . . .”

उसकी चीखें सीढ़ियाँ चढ़ रहे भीमा ठाकुर के कानों तक पहुँच गयी थीं। वह झपटते हुए ऊपर आये और . . .

‘अंबर की नीलिमा’ नीलिमा और अंबर के निश्छल प्रेम की कहानी है। ‘वनवास अकेले नहीं भोगूँगी’ कहानी में दीपिका बलात्कार से बचने के लिए झूठ का सहारा लेती है, लेकिन उसी झूठ को दीपिका के होने वाले सास ससुर और दीपिका का होने वाला पति स्वयं रजत जब उस झूठ को सच मानकर शादी तोड़ देते हैं, तब दीपिका फट पड़ती है “तुम मर्द हर युग में एक जैसे रहे हो। सीता हो या अहिल्या परीक्षा हमेशा नारी को ही देनी पड़ती है। किन्तु मिस्टर रजत राय, अब वक़्त बदल चुका है। मैं वनवास अकेली नहीं भोगूँगी। तुम्हें भी मेरे साथ वैराग्य भोगना होगा। मैं तो गंगा की तरह पवित्र थी लेकिन आपके इस लाड़ले ने मेरा मुँह काला किया है। मुझे एड्स का तोहफ़ा इसी ने दिया है।”

‘कविता के शब्द’ एक यथार्थ और सटीक कहानी है। यह कहानी महिला अस्मिता पर केंद्रित है। यह एक मज़बूत स्त्री की सशक्त कथा है। डांस, संगीत के टीवी शोज़ और फ़िल्मी दुनिया की अंदर की कहानी अलग ही है। परदे के पीछे नारी प्रतिभाओं को प्रतियोगिताओं में आगे बढ़ने के लिए अपने शरीर का सौदा करना पड़ता है। इस कहानी की केंद्र और मुख्य पात्र कविता है, जो एक सुन्दर और सुशील युवती है। उसका चरित्र निर्मल है। कविता का चरित्र एक ऐसा विशिष्ट चरित्र है जिसमें कई सारी ख़ूबियाँ कूट-कूटकर भरी हुई हैं। वह एक प्रगतिशील और परिपक्व विचारों की युवती है। नारी के दो स्वरूप होते हैं—एक रूप गृहलक्ष्मी का होता है अर्थात्‌ वह रूप संस्कारी और आदर्शवादी रूप है तो दूसरा रूप रणचंडी का भी है। ये दोनों रूप कविता के चरित्र में दृष्टिगोचर होते हैं। उसके ये दोनों रूप वक़्त और परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं व उसी के अनुरूप उजागर होते हैं। उसकी सोच सकारात्मक है और वह अपने दिल और दिमाग़ में किसी के भी प्रति वैमनस्य का भाव नहीं रखती है। वह सद्गुणों का ख़ज़ाना है। उसमें आत्मविश्वास और आत्मबल अधिक है। वह निसंकोची है। उसकी बातें साफ़गोई और खरीखरी होती है। वह जीवन से पलायन नहीं करना चाहती है। उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। उसमें जीवन से जूझने तथा वर्जनाओं को चुनौती देने का विद्रोह भरा भाव भी परिलक्षित होता है। वह अत्यंत सूझ-बूझ वाली शिक्षित युवती है। वह बला की हाज़िरजवाब, पुरुष मनोविज्ञान की अच्छी जानकार है। उसके विचार आधुनिक है, रूढ़िभंजक है। वह नारी को मात्र भोगविलास की वस्तु समझने वाली मानसिकता का प्रमुखता से विरोध करती है। समाज में नारी को अबला मानकर उसके साथ मनमानी करने वाले धूर्त चरित्रों से वह जूझती हुई दिखती है। वह युवतियों के लिए एक प्रेरक मिसाल है। इस कहानी की नायिका कविता अपनी एक अलग अस्मिता बनाती है। कथाकार ने कविता की संवेदना को बख़ूबी व्यक्त किया है। इस कहानी को पढ़ने के पश्चात कविता का सशक्त, आकर्षक और विलक्षण व्यक्तित्व मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। इस कहानी में पुरुष सत्तात्मक समाज के शोषण के प्रति कविता का विद्रोही स्वर सुनाई पड़ता है। इस कहानी में उपन्यास के तत्त्व मौजूद है। कथाकार को भारतीय संगीत के अलावा विदेशी संगीत का भी भरपूर ज्ञान है।

कश्मीर और असम में आतंकवादी भारतीय सेना के जवानों की ड्रेस पहनकर महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं जिससे भारतीय सेना बदनाम है, इस विषय को लेकर संजीव जायसवाल ने ‘ये कहाँ आ गये हम’ कहानी का सृजन किया है। ‘आज की सावित्री’ एक ऐसी कहानी है जिसमें एक पढ़ी लिखी स्त्री अपने विरुद्ध हो रहे अत्याचार पर चुप रह जाती है वहीं दूसरी ओर एक अनपढ़ स्त्री अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करती है। ‘असंतुलित रथ का हमसफर’ एक तरफ़ दीपा और रविश तथा दूसरी ओर दामिनी और गीतेश दोनों ही जोड़ियाँ अपनी अपनी घर गृहस्थी में अपने अपने पति का अत्याचार सहन नहीं कर पाती हैं और अपने अपने पति से तलाक़ लेकर स्वतन्त्र रूप से जीवन व्यतीत करती हैं।

इन कहानियों में स्त्री की मौजूदगी, समाज में रची-बसी पारम्परिक स्त्री वाली नहीं है। अधिकांश कहानियों के केन्द्र में आज की आधुनिक नवयुवतियाँ और उनके सरोकार हैं। लेखक युवा स्त्री पात्रों के चित्रण में कोई कमी नहीं करते, देहयष्टि से लेकर पहनावे, रंग-रूप का दर्शन करवा देते हैं और अपनी रुमानियत का परिचय भी। एक विशेषता और देखिए, कथाकार संजीव जायसवाल ‘संजय’ की कहानियों में बिंदास युवा स्त्रियाँ हैं। वे स्त्री पात्रों के चित्रण में अपनी रुमानियत का परिचय देते हैं। वे अपनी सभी कहानियों में आसपास के परिदृश्य, मौसम के साथ स्त्रियों की देह, उनके रंग रूप और उनकी अदाओं का दर्शन बेझिझक करवा देते हैं। कथाकार संजीव जायसवाल ने इस संग्रह की कहानियों में मुखर होकर अपने समाज और अपने समय की सच्चाइयों का वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया हैं। इनकी कहानियों में समाज के यथार्थ की अभिव्यक्ति है। इस संग्रह की कहानियाँ हमारे आज के समय का दर्पण है। प्रत्येक कहानी आँखों के सामने घटना का सजीव चित्र खड़ा कर देती है। कहानियों के कथ्यों में विविधता हैं। ये कहानियाँ जीवन से सार्थक संवाद करती हैं। कहानियाँ समाज के ज्वलंत मुद्दों से मुठभेड़ करती है और उस समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करती है।

इस कहानी संग्रह को पढ़कर लेखक के मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था, उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय मिलता है। सहज और स्पष्ट संवाद, घटनाओं का सजीव चित्रण इस संकलन की कहानियों में दिखाई देता हैं। कथाकार संजीव जायसवाल ‘संजय’ की कहानियों में नारी पात्र के विविध रूप चित्रित हुए हैं। कथाकार संजीव जायसवाल के नारी पात्र पुरुष से अधिक ईमानदार, व्यवहारिक, साहसी, कर्मठ, सबल, प्रगतिशील, स्वाबलंबी, कामकाजी, जुझारू और अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाली हैं। कहानियाँ नारी मन का मनोवैज्ञानिक तरीक़े से विश्लेषण करती हैं। संकलन की अधिकांश कहानियों के स्त्री पात्र विपरीत समय आने पर चुनौतियों का सामना करनेवाली सशक्त नारी के रूप में दिखाई देते हैं। संजीव जायसवाल की कहानियों के स्त्री चरित्र स्वयं निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। कथाकार स्त्रियों की ज़िन्दगी के हर पार्श्वो को देखने, छूने तथा उकेरने की निरंतर कोशिश करते हैं। इस संग्रह की कहानियों के सारे पात्र जाने पहचाने लगते हैं। लेखक ने परिवेश के अनुरूप भाषा और दृश्यों के साथ कथा को कुछ इस तरह बुना है कि कथा ख़ुद आँखों के आगे साकार होते चली जाती है। कथाकार ने इन कहानियों में बड़ी कुशलता से महिलाओं के मानसिक अंतर्द्वंद्व का चित्रण किया है। इनकी कहानियों के पात्र ज़ेहन में हमेशा के लिए बस जाते हैं। कहानियों के शीर्षक अत्यंत आकर्षक एवं विषयानुरूप है। संग्रह की कहानियाँ पाठक को बाँधे रखती हैं और साथ ही कथाकारों, समीक्षकों, आलोचकों को प्रभावित करती है। बेशक “मैं चुप नहीं रहूंगी” एक पठनीय और संग्रहणीय कृति है। संजीव जायसवाल ‘संजय’ की कृति “मैं चुप नहीं रहूंगी” का साहित्य जगत में स्वागत है, इस शुभकामना के साथ कि उनकी यह यात्रा जारी रहेगी।

दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर-452016
मोबाइल: 9425067036
मेल आईडी: deepakgirkar2016@gmail.com

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