झुकी आम की डाली देखो

15-07-2026

झुकी आम की डाली देखो

डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी  (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

झुकी आम की डाली देखो, आधी डूबी ताल। 
बच्चे हँसी-ठिठोली करते, बैठे अमुआ डाल॥
वो पानी से ही खेल रहे, एक दूजे का ख़्याल। 
शीतल जल शीतल पवन संग, मिटता है सब ज्वाल॥
 
मिलकर झूला झूलें देखो, करतब करें कमाल। 
कंकर पत्थर फेंक-फेंकर, पोखर मचा धमाल॥
हँसी-ख़ुशी से दिन ये बीते, नहीं कोई मलाल॥
झूम झूमकर पवन चले तो, झूमत मिले रसाल॥
 
हरे हरे पत्तों में छिपकर, लाएँ ख़ुशियाँ बहार। 
खेल रहे हैं आँख मिचौली, हर दिन ही त्योहार॥
कोयल कूके डाली-डाली, भौरों का गुंजार। 
मस्ताने मौसम पर भी है, छाया लगे ख़ुमार॥
 
गाँव गली के घर आँगन में, चिड़ियों का संसार। 
निज गृह ही सबसे प्यारा है, गगन भले विस्तार॥
दूर देश की ख़बरें लाएँ, मुँह में रखकर पान। 
तोता मैना मुँडेर बैठे, गीत सुरीला गान॥

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