धीरे-धीरे जलता दीपक
डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी
धीरे-धीरे जलता दीपक
मद्धिम-मद्धिम जिसकी लौ
अँधियारे से हर पल लड़ता
युग-युग की कथाएँ लिखता
अवनी पर तारों को लाता
चंचल मन को स्थिर कर जाता
पथ का सदैव भान कराता
ख़ुद से ख़ुद को लड़ना सिखाता
जीवन की अँधियारी बेला
आशाओं के दीप जलाना
सूरज के पहली किरणों का
प्रमुदित होकर स्वागत करना
अँधियारे में परिचय ख़ुद का
अंतस में एक ज्योति जलाना
जो भी कालिख बिखरी यहाँ पर
प्रखर पुंज से उसको मिटाना
1 टिप्पणियाँ
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22 Aug, 2025 04:15 PM
डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी जी की कविता, जीवन की निराशा से आशा की ओर उन्मुख करती कविता है । हार्दिक बधाई।