तीर्थराज प्रयाग
डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी
तीर्थ राजा कहे जो गये।
घाट धारा त्रिवेणी भये॥
हैं बुलाते चले आइये।
पाप धो पुण्य को पाइये॥
यज्ञ की है धरा पावनी।
संत बैठे लगा आसनी॥
है कथा देव की व्यापती।
भक्ति धारा बहे शाश्वती॥
कल्पवासी करें साधना।
ले ख़ुशी की यहाँ कामना॥
पूर्णता की करें याचना।
आ रहे वो करें प्रार्थना॥
भानुजा जाह्नवी शारदा।
हो रहा मेल जो प्राणदा॥
स्नान से पुण्य-आत्मा जगी।
भावना प्रेम से जो पगी॥
जो युगों की कथाएँ कहे।
चेतना शुद्ध धारा बहे॥
माघ मेला यहाँ है लगा।
शीत में उष्णता से जगा॥