व्यवहारिक ज्ञान
डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी
सौम्या चौंक गई थी जब उसकी ननद ने अपनी बेटी रूपा से कहा, “एक काम करो, ये जो मामी ने तुम्हारे लिए झुमका दिया है, उसे यहीं रख देना, ससुराल ले जाने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ तुम्हारी सास तुमसे लेकर तुम्हारी ननदों को दे सकती है। जब यहाँ दुबारा आना तब ले जाना।”
अभी कुछ दिन पहले की तो बात है सुजाता अक्सर सौम्या से कुछ न कुछ रस्मों के बहाने गहने कपड़े पैसे माँगती रहती थी। बड़ी ननद हैं तो वो भी सारी बातें मान लेती है अब घर में सासू माँ के न होने पर सारे फ़र्ज़ उसे ही निभाने थे।
आज रूपा को दिए जा रहे ज्ञान को सुन रही थी और मन ही मन सोच रही थी, ‘दीदी आप कौन हैं मेरी जो कभी मेरे कंगन, कभी चेन और कहीं अँगूठी पाकर बहुत प्रसन्न होती हैं।’ आज पाँच वर्ष हो गए और सौम्या ने उन्हें वही सब गहने दिए थे जो उसे शादी में मिले थे।